एवरेस्ट पर शवों की अदृश्यता: अरुण तिवारी की कहानी और उसके पीछे के कारण

हैदराबाद के टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी ने एवरेस्ट पर चढ़ाई की, लेकिन उनकी वापसी में उनकी तबियत बिगड़ गई। उनके परिवार ने निर्णय लिया कि शव को हिमालय में ही छोड़ दिया जाए, जो धार्मिक आस्था से प्रेरित था। इस लेख में जानें कि एवरेस्ट पर शवों को छोड़ने के पीछे के कारण क्या हैं, और परिवारों का दृष्टिकोण क्या होता है। इसके अलावा, जानें कि शव लाने का कार्य कौन करता है और यह निर्णय कैसे लिया जाता है।
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अरुण कुमार तिवारी की एवरेस्ट यात्रा

हैदराबाद के टेक्नोलॉजी पेशेवर अरुण कुमार तिवारी ने एवरेस्ट की चोटी पर विजय प्राप्त की, लेकिन उनकी वापसी में उनकी तबियत बिगड़ गई। खून की उल्टियों के बाद, शेरपाओं की कोशिशों के बावजूद, उनकी सांसें थम गईं। उनके परिवार ने निर्णय लिया कि वे उनकी शव को हिमालय में ही छोड़ देंगे। यह निर्णय उनके धार्मिक विश्वास से प्रेरित था, क्योंकि उनका मानना था कि वे शिव भक्त थे और अब शिवजी के पास रहेंगे। शव को नीचे लाने में आर्थिक चुनौतियाँ भी हैं, जिसके चलते पहले एक करोड़ रुपये की मांग की गई, फिर 94 लाख की। यह राशि किसी भी परिवार के लिए जुटाना आसान नहीं होता।


एवरेस्ट पर शवों का छोड़ना: एक सामान्य प्रथा

एवरेस्ट, जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, हर साल कई पर्वतारोहियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। हालांकि, हर साल कई लोग वापस नहीं लौटते और उनकी लाशें वहीं छोड़ दी जाती हैं। अरुण तिवारी का मामला इस संदर्भ में नया नहीं है। एवरेस्ट पर आठ हजार मीटर से ऊपर का क्षेत्र 'डेथ जोन' कहलाता है, जहां ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक ठंड के कारण लाशें बर्फ में जम जाती हैं।


शव लाने में चुनौतियाँ

शव को नीचे लाना एक कठिन कार्य है। एक शव का वजन बर्फ के साथ मिलकर डेढ़ कुंतल तक हो सकता है। चढ़ाई करने वाले पहले से ही थके होते हैं और उन्हें ऑक्सीजन मास्क का सहारा लेना पड़ता है। शव उठाना जानलेवा हो सकता है, और कई बार बचाव दल के सदस्यों की भी जान चली जाती है। मौसम भी एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि खराब मौसम में शव ले जाना असंभव हो जाता है।


परिवार का दृष्टिकोण

अरुण तिवारी के परिवार ने यह निर्णय लिया कि शव को नीचे नहीं लाया जाएगा। यह उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन धार्मिक आस्था ने उन्हें इस निर्णय पर मजबूर किया। कई परिवारों का मानना है कि हिमालय में अंतिम सांस लेना सम्मान की बात है।


शव लाने वाले लोग

शव को नीचे लाने का कार्य मुख्य रूप से शेरपा करते हैं, जो स्थानीय लोग होते हैं और पर्वतारोहियों की मदद करते हैं। नेपाल की सेना भी इस कार्य में सहायता करती है। कुछ पेशेवर रेस्क्यू टीमें भी होती हैं, जो एक्सपीडिशन कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं।


निर्णय प्रक्रिया

शव लाने का निर्णय कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे सुरक्षा, परिवार की राय, मौसम और आर्थिक स्थिति। यदि परिवार शव लाने की इच्छा व्यक्त करता है, तो प्रयास किए जाते हैं।


एवरेस्ट पर शवों की संख्या

आंकड़ों के अनुसार, एवरेस्ट पर कई सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, और दो सौ से अधिक शव अभी भी वहीं पड़े हैं। क्लीन-अप के दौरान शवों को किनारे कर दिया जाता है ताकि वे लोगों को दिखाई न दें।


प्रसिद्ध शवों की कहानियाँ

ग्रीन बूट्स के नाम से मशहूर पर्वतारोही से वांग पालजोर और स्लीपिंग ब्यूटी के नाम से जानी जाने वाली फ्रांसिस अर्सेन्टिएव की कहानियाँ भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।