एवरेस्ट डे: जानें डेथ जोन और चढ़ाई की चुनौतियाँ
एवरेस्ट पर चढ़ाई का कठिन सफर
तेलंगाना के हैदराबाद निवासी टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी की हाल ही में एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान डेथ जोन में सांसें थम गईं। उनके परिवार ने निर्णय लिया है कि वे अरुण का शव हिमालय में ही छोड़ देंगे। यह एक अत्यंत कठिन निर्णय है। एवरेस्ट पर मौतें अक्सर आस्था, आर्थिक स्थिति, मौसम की खराबी आदि कारणों से होती हैं। आइए, अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट डे के अवसर पर जानते हैं कि डेथ जोन की ऊंचाई क्या है और यह मौत के खतरे को कैसे बढ़ाता है। एवरेस्ट तक पहुँचने के रास्ते, अनुमति लेने की प्रक्रिया, पिछले पांच वर्षों में कितने लोग गए, और इमरजेंसी में सहायता कैसे मिलती है, इन सभी पर चर्चा करेंगे।
एवरेस्ट डे का महत्व
हर साल 29 मई को विश्वभर में एवरेस्ट डे मनाया जाता है। इसी दिन 1953 में एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने पहली बार माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा था। एवरेस्ट केवल एक पर्वत नहीं है, बल्कि यह साहस, तैयारी, अनुशासन और धैर्य की परीक्षा है। यहाँ का मौसम अचानक बदल सकता है और ऑक्सीजन की कमी से शरीर थक जाता है। इसलिए, एवरेस्ट पर चढ़ाई को दुनिया की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक माना जाता है।
डेथ जोन की परिभाषा
माउंट एवरेस्ट पर लगभग 8,000 मीटर की ऊँचाई के ऊपर का क्षेत्र डेथ जोन कहलाता है। इस ऊँचाई पर शरीर को जीवित रखना अत्यंत कठिन हो जाता है। यहाँ ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। शरीर की ताकत तेजी से घटती है और मानसिक कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए, इस क्षेत्र में अधिक समय बिताना जानलेवा हो सकता है।
डेथ जोन में मौत का खतरा
डेथ जोन में शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है। सांसें तेज हो जाती हैं, लेकिन शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। इससे चक्कर, थकान और निर्णय लेने की क्षमता में कमी आ जाती है। कई बार फेफड़ों में पानी भरने की समस्या भी उत्पन्न होती है, जिसे हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा कहा जाता है। इसके अलावा, दिमाग में सूजन आ सकती है, जिसे हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा कहते हैं।
एवरेस्ट पर चढ़ने के प्रमुख रास्ते
एवरेस्ट तक पहुँचने के दो मुख्य रास्ते हैं: एक नेपाल से और दूसरा तिब्बत से।
- दक्षिणी मार्ग: यह सबसे लोकप्रिय मार्ग है, जिसमें काठमांडू से लुकला पहुँचकर ट्रेक करते हुए एवरेस्ट बेस कैंप तक जाते हैं। इसके बाद खुंबू आइसफॉल, वेस्टर्न कूम, ल्होत्से फेस, साउथ कोल और फिर शिखर की ओर बढ़ते हैं।
- उत्तरी मार्ग: यह मार्ग तिब्बत की ओर जाता है। यहाँ सड़कें बेहतर हैं, लेकिन मौसम और हवा की स्थिति कठिन हो सकती है।
एवरेस्ट पर चढ़ाई की तैयारी
एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए महीनों या कभी-कभी वर्षों की तैयारी करनी होती है। पर्वतारोहियों को पहले छोटे और मध्यम ऊँचाई वाले पहाड़ों पर चढ़ाई का अनुभव लेना आवश्यक है। इसके लिए बर्फ, ग्लेशियर, रस्सी, क्रैम्पॉन, आइस ऐक्स और फिक्स्ड रोप का अभ्यास करना जरूरी है।
एवरेस्ट पर चढ़ाई का सही समय
एवरेस्ट पर चढ़ाई का सबसे उपयुक्त समय अप्रैल और मई माना जाता है। इस समय मौसम में थोड़ी स्थिरता होती है और हवा कम होती है। पर्वतारोही इस समय का इंतजार करते हैं।
परमिट प्राप्त करने की प्रक्रिया
यदि कोई नेपाल से एवरेस्ट चढ़ना चाहता है, तो उसे नेपाल सरकार से परमिट प्राप्त करना होता है। यह आमतौर पर मान्यता प्राप्त एक्सपीडिशन एजेंसी के माध्यम से किया जाता है।
एवरेस्ट पर चढ़ाई का खर्च
एवरेस्ट पर चढ़ाई सस्ती नहीं होती। इसमें परमिट, गाइड, शेरपा, ऑक्सीजन, बीमा, उपकरण, यात्रा और प्रशिक्षण का खर्च शामिल होता है।
पिछले पांच वर्षों में चढ़ाई करने वालों की संख्या
नेपाल से सबसे अधिक लोग एवरेस्ट पर चढ़ते हैं। 2021 में 394 परमिट जारी किए गए थे, जबकि 2023 में यह संख्या 466 थी। 2026 में 492 परमिट जारी होने की जानकारी मिली है।
इमरजेंसी में सहायता
एवरेस्ट पर बचाव कार्य आसान नहीं होता। बेस कैंप तक हेलिकॉप्टर मदद पहुंचा सकते हैं, लेकिन डेथ जोन में बचाव करना बेहद कठिन होता है।
एवरेस्ट की कहानी
एवरेस्ट केवल जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह सीमाओं को पहचानने की भी कहानी है। यह सिखाता है कि तैयारी, विनम्रता और सही निर्णय जान बचाते हैं।
