उत्तराखंड में टीबी का बढ़ता संकट: स्वास्थ्य विभाग की नई पहल

उत्तराखंड में ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिससे स्वास्थ्य विभाग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं चिंतित हैं। हर साल लगभग 28 हजार नए मरीज सामने आ रहे हैं। हरिद्वार, चमोली और अन्य जिलों को उच्च जोखिम में रखा गया है। स्वास्थ्य विभाग ने व्यापक स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है, जिसमें 14 साल से ऊपर के सभी लोगों की एक्स-रे जांच अनिवार्य की गई है। इसके अलावा, 'टीबी मुक्त पंचायत' अभियान के तहत गांवों को टीबी मुक्त घोषित करने का लक्ष्य है। जानें इस संकट से निपटने के लिए सरकार की नई पहल और योजनाएँ।
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उत्तराखंड में टीबी का बढ़ता संकट: स्वास्थ्य विभाग की नई पहल

टीबी का बढ़ता खतरा

उत्तराखंड में टीबी का बढ़ता संकट: स्वास्थ्य विभाग की नई पहल

चमोली: उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट उभर रहा है। राज्य के 4216 गांवों में ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे स्वास्थ्य विभाग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं चिंतित हैं। हर साल लगभग 28 हजार नए टीबी मरीज सामने आ रहे हैं, जो इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाता है.

हरिद्वार और चमोली जैसे जिले उच्च जोखिम में
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, टीबी संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के मामलों में कई जिले बेहद संवेदनशील स्थिति में पहुंच गए हैं। हरिद्वार, चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे जिलों को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है। इन क्षेत्रों में टीबी की रोकथाम और उपचार के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं.

गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने व्यापक स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है। प्रभावित गांवों में 14 साल से अधिक आयु के सभी लोगों की एक्स-रे जांच अनिवार्य कर दी गई है। इस अभियान के तहत केंद्र सरकार ने 14 लाख ग्रामीणों की जांच का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तक करीब पांच लाख लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, जबकि लगभग दस लाख लोगों की जांच अभी बाकी है.

स्क्रीनिंग प्रक्रिया के लिए भेजी गई 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें
स्क्रीनिंग प्रक्रिया को तेज करने के लिए राज्य में 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें भेजी गई हैं और 19 नई मशीनें जल्द ही उपलब्ध कराई जाएंगी। इन संसाधनों के माध्यम से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि टीबी के मामलों में बढ़ोतरी चिंता का विषय है, लेकिन उपचार के स्तर पर सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत करीब 91 प्रतिशत मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही मरीजों को पोषण सहायता के रूप में हर महीने 1000 रुपये दिए जा रहे हैं, जिससे उनकी रिकवरी में मदद मिल सके.

राज्य में राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत 13 जिला टीबी केंद्र, 98 ब्लॉक स्तर की टीबी यूनिट और 157 सक्रिय जांच केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इसके अलावा ब्लॉकों में 131 आधुनिक जांच मशीनें भी लगाई गई हैं, जो जांच प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना रही हैं.

टीबी खत्म करने के लिए ‘टीबी मुक्त पंचायत’ अभियान
स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार टीबी उन्मूलन के लिए पूरी गंभीरता से काम कर रही है। स्क्रीनिंग और उपचार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में टीबी को खत्म करने के लिए ‘टीबी मुक्त पंचायत’ अभियान भी चलाया जा रहा है। इस योजना के तहत निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले गांवों को टीबी मुक्त घोषित करने का लक्ष्य रखा गया है.

विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ी क्षेत्रों में टीबी के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण हैं। इनमें स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, कुपोषण, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, शुरुआती लक्षणों की अनदेखी और समय पर जांच व इलाज में देरी प्रमुख हैं। कुल मिलाकर, उत्तराखंड में टीबी एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है, लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से इस पर काबू पाने की उम्मीद भी मजबूत हो रही है.