उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजना में मजदूरों पर गिरा मलबा, बचाव अभियान जारी

उत्तराखंड के चमोली में एक जलविद्युत परियोजना की सुरंग में मलबा गिरने से 22 मजदूर फंस गए। बचाव दल ने कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए कई श्रमिकों को सुरक्षित निकाला, लेकिन कुछ की जान चली गई। यह घटना सुरक्षा मानकों की कमी और भूगर्भीय संरचना की अनदेखी की ओर इशारा करती है। क्या भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे? जानें पूरी जानकारी इस लेख में।
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चमोली में जलविद्युत परियोजना का हादसा


चमोली (उत्तराखंड)। हिमालय की गोद में स्थित एक महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजना की सुरंग अचानक एक भयानक हादसे का स्थल बन गई। गुरुवार शाम लगभग सात बजे, जब अलकनंदा नदी पर बन रही विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना की टेल रेस टनल (टीआरटी) में श्रमिक काम कर रहे थे, तभी एक जोरदार धमाके के साथ भारी मलबा और पानी सुरंग में घुस आया। कुछ ही क्षणों में, टनल का लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर का हिस्सा पानी, कीचड़ और पत्थरों से भर गया। मलबे की मात्रा इतनी अधिक थी कि बचाव दल के अधिकारियों ने इसे चार मंजिला इमारत के बराबर बताया।


मजदूरों की जान बचाने की जंग

सुरंग के अंदर काम कर रहे लगभग 22 श्रमिक फंस गए। अचानक आई इस आपदा ने सभी को चौंका दिया। पानी का तेज बहाव इतना शक्तिशाली था कि कई श्रमिकों के कपड़े तक उतर गए और मलबा दूर-दूर तक फैल गया। सुरंग के अंदर ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरने लगा। अंधेरा, कीचड़, गले तक भरा पानी और सांस लेने के लिए पर्याप्त हवा न होना—ये सभी हालात मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हुए।


बचाव अभियान की चुनौतियाँ

रात भर चली जानलेवा जंग


हादसे की सूचना मिलते ही एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्थानीय प्रशासन, पुलिस और परियोजना कर्मियों की टीमें मौके पर पहुंच गईं। लेकिन बचाव कार्य आसान नहीं था। सुरंग के अंदर कई स्थानों पर तीन से पांच फीट गहरा पानी भरा हुआ था। तेज बहाव के कारण लापता श्रमिकों की सही लोकेशन का पता लगाना भी कठिन हो गया। ऑक्सीजन की कमी के कारण बचाव दल को एक-एक घंटे की शिफ्ट में काम करना पड़ा। रात में हालात और बिगड़ गए। दलदल, पानी और ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए कुछ समय के लिए अभियान रोकना पड़ा।


विशेष उपकरणों का उपयोग

बचाव दल ने विशेष उपकरण, सक्शन पंप, गैस मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ सुरंग में प्रवेश किया। पानी निकालने और मलबा हटाने का कार्य युद्ध स्तर पर शुरू हुआ। कुछ श्रमिकों को नीले ड्रम और विशेष उपकरणों की मदद से बाहर निकाला गया। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार 12 श्रमिक सुरक्षित बाहर निकाले गए, जबकि 10 की मौत हो गई। कुछ दिन तक रेस्क्यू अभियान जारी रहा और अंततः सभी फंसे श्रमिकों का रेस्क्यू पूरा कर लिया गया।


परिवारों का दुख और सवाल

परिवारों का इंतजार और सवाल


हादसे की खबर फैलते ही श्रमिकों के परिवारों में मातम छा गया। कई परिवार अन्य राज्यों से आए थे। मृतकों के परिजन मुआवजे और न्याय की मांग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री और आपदा प्रबंधन मंत्री मौके पर पहुंचे और बचाव अभियान का जायजा लिया। सरकार ने मृतकों के परिजनों को मुआवजे का आश्वासन दिया है।


भविष्य के लिए सबक

यह हादसा सिल्क्यारा टनल जैसी पुरानी घटनाओं की याद दिलाता है, जहां भी श्रमिक लंबे समय तक मलबे में फंसे रहे थे। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान भूगर्भीय संरचना, पानी के रिसाव और सुरक्षा मानकों पर और सख्ती से ध्यान देने की आवश्यकता है।


टनल में चार मंजिला इमारत जितना मलबा, ऑक्सीजन की कमी और जानलेवा पानी—ये सब मिलाकर यह घटना श्रमिकों की जान बचाने की एक लंबी और कठिन जंग साबित हुई। बचाव दल की मेहनत से कई जिंदगियां बचाई गईं, लेकिन कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाएंगे?