उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्या मामले पर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्या मामले में हाई कोर्ट ने राजनीतिक दलों को कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम से जुड़े सभी मानहानिकारक पोस्ट हटाने का आदेश दिया। यह मामला केवल एक व्यक्ति की मानहानि का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का भी है, जो संवेदनशील घटनाओं को सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बना देती है। जानें इस मामले में अदालत के आदेश और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ।
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उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्या मामले पर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

हाई कोर्ट का न्यायिक हस्तक्षेप

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी की हत्या से जुड़े मामले में सोशल मीडिया पर फैल रही राजनीतिक अफवाहों और आरोपों पर अंततः न्यायालय ने हस्तक्षेप किया है। उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम को इस गंभीर अपराध से जोड़ने वाली सभी पोस्टें तुरंत हटा दें। अदालत ने कहा कि बिना ठोस सबूत के किसी की छवि को नुकसान पहुंचाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह कानून के खिलाफ भी है।


राजनीतिक आरोपों का मामला

यह मामला तब तूल पकड़ा जब कांग्रेस और आप से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स पर लगातार ऐसी पोस्टें साझा की जाने लगीं, जिनमें अंकिता भंडारी की हत्या को दुष्यंत कुमार गौतम से जोड़ने का प्रयास किया गया। इन पोस्टों में न तो कोई दस्तावेज था और न ही कोई प्रमाण, केवल राजनीतिक शोर और भावनात्मक उकसावे का खेल चल रहा था। भाजपा नेता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और इसे एक सुनियोजित मानहानि अभियान बताया।


अदालत का स्पष्ट संदेश

सुनवाई के दौरान, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी की इज्जत को नुकसान पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और एक महिला उर्मिला द्वारा पोस्ट किए गए सभी कथित मानहानिकारक कंटेंट को 24 घंटे के भीतर हटाने का आदेश दिया। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में ऐसी गतिविधियाँ दोहराई गईं, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।


भाजपा की प्रतिक्रिया

भाजपा प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने इस निर्णय को कानून की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो सस्ती राजनीति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा कि बिना तथ्यों के पोस्ट डालना गंदी राजनीति का सबसे घटिया रूप है और अदालत ने इस पर स्पष्ट रेखा खींच दी है।


दुष्यंत कुमार गौतम की भावनाएँ

दुष्यंत कुमार गौतम ने भावुक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक पीड़ित परिवार के दर्द को राजनीतिक हथियार बनाकर तीन साल से अधिक समय तक उनका नाम घसीटा गया। उन्होंने याद दिलाया कि इतने समय में विपक्ष एक भी ऐसा दस्तावेज पेश नहीं कर सका जिससे उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि हो सके।


राजनीतिक संस्कृति पर सवाल

यह मामला केवल एक व्यक्ति की मानहानि का नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जो हर संवेदनशील घटना को सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बना देती है। अंकिता भंडारी की हत्या एक भयावह अपराध है, जिसने समाज को झकझोर दिया था। लेकिन इस पर न्याय की मांग करने के बजाय, राजनीतिक दलों ने इसे अपने फायदे के लिए उछाल दिया। बिना प्रमाण किसी का नाम उछाल देना न तो पीड़िता को न्याय दिलाता है और न ही समाज को सच्चाई के करीब ले जाता है।


लोकतंत्र में कानून की प्राथमिकता

हाई कोर्ट का आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र में कानून सबसे ऊपर है, न कि ट्रेंडिंग हैशटैग। विपक्ष का यह तर्क कि सवाल पूछना उनका अधिकार है, तब तक ठीक है जब तक सवाल तथ्यों पर आधारित हों। लेकिन जब सवाल आरोप में बदल जाएं और आरोप प्रचार में, तब यह लोकतांत्रिक बहस नहीं बल्कि भीड़तंत्र बन जाता है। न्यायालय ने इसी भीड़तंत्र पर ब्रेक लगाया है।


राजनीतिक दलों के लिए संदेश

आज की आवश्यकता है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। सत्ता मिले या न मिले, इंसाफ और सच्चाई से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है। यदि अदालतों को बार-बार यह कहना पड़े कि बिना सबूत किसी पर आरोप न लगाएं, तो यह राजनीति के नैतिक दिवालियेपन का संकेत है। हाई कोर्ट का यह आदेश केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।