उच्चतम न्यायालय ने शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद में सर्वे पर रोक लगाई

उच्चतम न्यायालय ने शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में सर्वे पर रोक लगाते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को शीर्ष अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश के संदर्भ में आगे नहीं बढ़ना चाहिए था। इस आदेश के तहत, सभी अदालतों को नए मुकदमे दर्ज करने और लंबित मामलों में कोई प्रभावी आदेश देने से रोका गया है। मस्जिद समिति ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें 1991 के उपासना स्थल अधिनियम का भी उल्लेख किया गया है। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और आगे की सुनवाई के बारे में।
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उच्चतम न्यायालय का महत्वपूर्ण आदेश

नई दिल्ली, 28 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने बताया कि संभल की अदालत द्वारा शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में सर्वे का आदेश देने के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को शीर्ष अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश के संदर्भ में आगे नहीं बढ़ना चाहिए था। 12 दिसंबर 2024 को दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश में, उच्चतम न्यायालय ने देश की सभी अदालतों को अगले आदेश तक नए मुकदमे दर्ज करने और लंबित मामलों में कोई प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश देने से रोक दिया था। ये मामले विशेष रूप से धार्मिक स्थलों, खासकर मस्जिदों और दरगाहों से संबंधित थे।


उपासना स्थल अधिनियम का संदर्भ

यह आदेश उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया था। इस कानून के तहत किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक है और यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी उपासना स्थल का 15 अगस्त 1947 तक का धार्मिक स्वरूप बरकरार रखा जाए। हालांकि, अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।


संभल की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति की याचिकाएं

संभल की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 19 मई 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर विचार किया। उच्च न्यायालय ने शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में संभल की अदालत द्वारा दिए गए सर्वे के आदेश के खिलाफ मस्जिद समिति की याचिका को खारिज कर दिया था।


मस्जिद समिति की दलीलें

उच्च न्यायालय ने कहा था कि ‘कोर्ट कमिश्नर’ नियुक्त करने का आदेश और मुकदमा दोनों सुनवाई योग्य हैं। मस्जिद समिति की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी ने न्यायालय में दलील दी कि पहला सवाल यह है कि दिसंबर 2024 के उच्चतम न्यायालय के आदेश को देखते हुए उच्च न्यायालय इस मामले में आगे कैसे बढ़ सकता था। उन्होंने कहा, “इस आदेश को देखते हुए उच्च न्यायालय आगे नहीं बढ़ सकता था।”


1991 के कानून का महत्व

उन्होंने 1991 के कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य विवादों को बढ़ने से रोकना था। इस मामले में दलीलें चार अगस्त को भी जारी रहेंगी। मस्जिद समिति ने उच्च न्यायालय में 19 नवंबर 2024 के दीवानी न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी।


सर्वे का विवाद

दीवानी न्यायाधीश ने मुगलकालीन मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था और उसी दिन सर्वे भी किया गया था। समिति का दावा था कि 24 नवंबर 2024 को किया गया दूसरा सर्वे अवैध था, क्योंकि दीवानी अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था। पिछले साल 22 अगस्त को उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ मस्जिद समिति की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताई थी।


उच्चतम न्यायालय का निर्देश

उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था, “इस बीच, सभी पक्ष आज की स्थिति के अनुसार यथास्थिति बनाए रखें।” संभल की दीवानी अदालत में एक मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि संभल में एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। याचिका में कहा गया था कि मुगल बादशाह बाबर ने 1526 में हरिहर मंदिर को तोड़कर इस मस्जिद का निर्माण कराया था। उच्चतम न्यायालय ने 29 नवंबर 2024 को संभल की अदालत को मस्जिद और चंदौसी में उसके सर्वे से जुड़े मामले की कार्यवाही रोकने का आदेश दिया था।


शांति बनाए रखने का निर्देश

साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को शहर में शांति एवं सद्भाव बनाए रखने का निर्देश दिया गया था।