उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को सुनवाई में देरी पर चेताया

उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को आपराधिक मुकदमों की सुनवाई में देरी और जमानत याचिकाओं के विरोध पर कड़ी चेतावनी दी है। न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार का यह रवैया जारी रहा, तो इसे जनता के सामने उजागर किया जाएगा। सुनवाई के दौरान, एक आरोपी ने बताया कि उसे चार साल से जेल में रखा गया है, जबकि उसके मामले की सुनवाई में कई बार देरी हुई। न्यायालय ने सरकार को सुनवाई प्रक्रिया को तेज करने के लिए विशेष नीति बनाने का निर्देश दिया है।
 | 
gyanhigyan

सुनवाई में तेजी लाने की आवश्यकता

उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक मामलों की सुनवाई में देरी और केवल जमानत याचिकाओं का विरोध करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने राज्य सरकार को चेतावनी दी कि यदि यह रवैया जारी रहा, तो इसे जनता के सामने उजागर किया जाएगा।


जमानत याचिका पर सुनवाई

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने एक विदेशी नागरिक की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि महाराष्ट्र से रोजाना ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां सरकार जमानत का विरोध तो करती है, लेकिन मुकदमे की सुनवाई को तेज करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती। पीठ ने कहा कि जब न्यायालय इन मामलों की गहराई से जांच करता है, तो सबूत अक्सर कमजोर पाए जाते हैं।


आरोपी की स्थिति

सुनवाई के दौरान, अपहरण और हत्या के मामले में गिरफ्तार आरोपी ने बताया कि वह पिछले चार वर्षों से जेल में है। इस दौरान, उसके मामले को निचली अदालत में 86 बार सूचीबद्ध किया गया, लेकिन उसे 53 बार अदालत में पेश नहीं किया गया। उच्चतम न्यायालय ने इसे महाराष्ट्र सरकार की एक गंभीर चूक माना है।


मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

पीठ ने आरोपी के शीघ्र सुनवाई के मौलिक अधिकार पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि चार साल में 34 गवाहों में से केवल दो गवाहों से ही पूछताछ हो पाई, जो चिंताजनक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब राज्य सरकार जमानत का विरोध करती है, तो मुकदमे को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है, जिसमें वह विफल रही है।


सरकार की प्रतिक्रिया

महाराष्ट्र सरकार के वकील ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि अब सभी आरोपियों को सुनवाई की हर तारीख पर अदालत में पेश किया जा रहा है। न्यायालय ने राज्यों को सुनवाई प्रक्रिया को तेज करने के लिए एक विशेष नीति बनाने का निर्देश दिया। पीठ ने आदेश दिया कि हर हफ्ते कम से कम चार गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं और इसका रिकॉर्ड सुनवाई करने वाली अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में ऐसे मामले दोबारा आए, तो और भी सख्त निर्देश जारी किए जाएंगे।