उच्चतम न्यायालय ने पैलेट गन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से किया इनकार

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में पैलेट गन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया है, यह कहते हुए कि मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत सुरक्षा एजेंसियों को विशेष परिस्थितियों में इसके उपयोग की अनुमति है। अदालत ने दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट गन के उपयोग से संबंधित याचिका पर सुनवाई की और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह हथियारों के उपयोग का रिकॉर्ड सुरक्षित रखे। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि पैलेट गन का गलत इस्तेमाल होता है, तो ऐसे मामलों की जांच की जा सकती है।
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पैलेट गन के उपयोग पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय

उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को यह स्पष्ट किया कि मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत सुरक्षा एजेंसियों को विशेष परिस्थितियों में भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन का उपयोग करने की अनुमति है, इसलिए इन पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि इनका गलत इस्तेमाल होता है, तो ऐसे मामलों की जांच तथ्यों के आधार पर की जा सकती है। हाल ही में दिल्ली में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र लीक के विरोध में छात्रों द्वारा किए गए प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट गन के उपयोग से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि जंतर-मंतर पर तैनात द्रुत कार्य बल (आरएएफ) के हथियारों के उपयोग का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए।


न्यायालय ने कहा कि पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरडी) की सलाह के अनुसार, असाधारण परिस्थितियों में पैलेट गन का उपयोग किया जा सकता है। इस आधार पर, पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की याचिका को अदालत ने ‘अस्पष्ट’ करार दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर की दलीलों पर गौर किया और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन में पैलेट गन से घायल हुए प्रशांत कुमार और शेख इरशाद मंसूरी को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए।


न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “याचिका पैलेट गन के उपयोग के खिलाफ है। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में पुलिस को नियमों के तहत पैलेट गन का उपयोग करने की अनुमति है। यदि आप इसके उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना चाहते हैं, तो आपको अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के उल्लंघन के आधार पर उस प्रावधान को चुनौती देनी होगी।” पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त यशोवर्धन आजाद और पैलेट गन से घायल दो व्यक्तियों ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए धातुयुक्त पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है।


पीठ ने आजाद और अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार और आरएएफ के पुलिस महानिरीक्षक को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अनुरोध ‘अस्पष्ट’ है, क्योंकि याचिका में उन पुलिस नियमों को चुनौती नहीं दी गई है जो ऐसे हथियारों के उपयोग की अनुमति देते हैं। ग्रोवर ने कहा कि ऐसे नियम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं और उन्होंने पीठ से केंद्र सरकार को उन्हें अदालत के रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश देने का अनुरोध किया।


जानकारी के अनुसार, सिंह और मंसूरी को 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) द्वारा आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान धातुयुक्त छर्रों से चोटें आई थीं। ग्रोवर ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के मामले में धातुयुक्त छर्रों का उपयोग किया गया था और ये छर्रे उनके शरीर से निकाले गए। उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह रही हूं कि आरएएफ के शस्त्रागार में पैलेट गन नहीं होनी चाहिए। यहां मामला अलग है। यहां धातुयुक्त छर्रों का इस्तेमाल किया गया है।”


पीठ ने कहा कि वह किसी विशेष घटना में पैलेट गन के उपयोग की वैधता की जांच करने के लिए तैयार है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना होगा कि उस स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनाई जाने वाली ‘क्रमिक प्रतिक्रिया’ के तहत पैलेट गन के उपयोग की अनुमति थी या नहीं। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि राहत संबंधी उनका अनुरोध केवल धातुयुक्त छर्रों के उपयोग तक सीमित है। उन्होंने कहा, “दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं है जो पैलेट के उपयोग की अनुमति देता हो। यही मेरी दिक्कत है और इसी कारण मुझे बीपीआरडी की परामर्शिका पर निर्भर रहना पड़ रहा है।”


यदि ऐसा कोई स्थायी आदेश है तो केंद्र सरकार उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। मुझे पूरा विश्वास है कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस निर्दोष युवाओं पर पैलेट नहीं चलाना चाहेंगी।” ग्रोवर ने कहा, “मुझे दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं मिला।” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीठ की सहायता के लिए जो भी आवश्यक होगा, सरकार वह करेगी। ग्रोवर ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 28 जुलाई को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी कैमरा फुटेज और वायरलेस लॉग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था, लेकिन उसने विशेष रूप से आरएएफ के हथियारों के उपयोग के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का उल्लेख नहीं किया था।


इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “जांच के लिए जो भी आवश्यक होगा, उसे सुरक्षित रखा जाएगा।” पीठ ने कहा कि कोई भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है, और असामाजिक तत्वों के घुसपैठ की संभावना होती है, ऐसे में कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा क्रमिक प्रतिक्रिया अपनाना आवश्यक हो सकता है। यशोवर्धन आजाद ने देशभर में नागरिकों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए ‘पंप-एक्शन’ या ‘प्रोजेक्टाइल-एक्शन’ गन से दागी जाने वाली पूरी तरह या आंशिक रूप से धातुयुक्त छर्रों वाली गोलियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया है।


उनका कहना है कि ऐसे हथियार बल प्रयोग से संबंधित संवैधानिक मानकों के मूलतः प्रतिकूल हैं। याचिका में घटना में कथित रूप से घायल हुए सभी लोगों को उचित मुआवजा, समुचित उपचार और पुनर्वास की सुविधा मुहैया कराने का भी अनुरोध किया गया है। याचिका के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान भीड़ से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस की सहायता के लिए तैनात आरएएफ ने पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया।


इसके बाद कनॉट प्लेस के निकट धातुयुक्त छर्रों से भरी पंप-एक्शन बंदूक चलाई गई। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बल प्रयोग बढ़ाने से पहले न तो कोई पूर्व चेतावनी दी गई और न ही कोई सार्वजनिक घोषणा की गई, जिसके कारण कई प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें आंखों में चोट लगने के मामले भी शामिल हैं।


याचिका में कहा गया है कि पैलेट गन को भले ही अक्सर ‘कम घातक’ हथियार बताया जाता है, लेकिन इससे बड़ी संख्या में छर्रे व्यापक क्षेत्र में फैल जाते हैं। इस कारण इन्हें किसी एक व्यक्ति पर सटीक रूप से निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इससे आंखों तथा शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों में गंभीर चोट लगने का बड़ा खतरा रहता है।