उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने पर राज्य सरकारों को निर्देश दिए
उच्चतम न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
(फाइल फोटो के साथ) नयी दिल्ली, पांच अगस्त: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के खिलाफ राज्य सरकारें वित्तीय बोझ का बहाना नहीं बना सकतीं। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे पर पुनर्विचार करें और दो सप्ताह के भीतर निर्णय लें। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने कहा कि वित्तीय बोझ की चिंताएं ‘गलतफहमी पर आधारित’ हैं।
खंडपीठ ने कहा, ‘‘हम सभी राज्य सरकारों से अनुरोध करते हैं कि वे न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के विषय पर पुनर्विचार करें, भले ही अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति की उम्र कुछ भी हो।’’ शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखने से राजस्व पर पड़ने वाला बोझ सेवानिवृत्ति के कारण खाली हुई जगहों को भरने की तुलना में कम होगा।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया, ‘‘हमें इस बात पर संदेह नहीं है कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखने से राज्य को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद होने वाले खर्च की तुलना में कम वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।’’ उन्होंने कहा कि इसलिए सेवानिवृत्ति की उम्र न बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों द्वारा दी गई वजहें सही नहीं हैं। हालांकि, खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे को आपसी सहमति से हल किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में त्वरित विचार करने का निर्देश दिया और कहा कि दो हफ़्ते के भीतर एक स्वतंत्र और व्यावहारिक निर्णय लिया जाए। पहले, शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा था कि वे न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 61 साल करने पर विचार करें। यह खंडपीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ज़िला न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने का अनुरोध किया गया था।
खंडपीठ ने आदेश दिया, ‘‘सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया जाता है कि वे इस मामले पर अपने संबंधित उच्च न्यायालय से सलाह-मशविरा करके निर्णय लें।’’ यदि वे सहमत होते हैं, तो उन राज्यों में न्यायिक अधिकारियों को 61 साल की उम्र तक सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाएगी। यह अनुमति इन कार्यवाही के अंतिम परिणामों पर निर्भर करेगी।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 साल है, जबकि उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 62 साल की उम्र में सेवा से अवकाश ग्रहण करते हैं। यह मामला उच्चतम न्यायालय के 2002 के उस फ़ैसले के बाद उठा है, जिसमें न्यायमूर्ति के. जगन्नाथ शेट्टी आयोग की सिफारिश को मानने से इनकार कर दिया गया था। आयोग ने ज़िला न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 62 साल करने का प्रस्ताव दिया था। तब से, तेलंगाना और मध्यप्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
