उच्चतम न्यायालय ने जमानत आदेशों पर दी महत्वपूर्ण टिप्पणी
जमानत आदेशों पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में विस्तृत कारणों का अभाव होने पर भी उस पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं होती है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का निर्धारण अभियोजन पक्ष के मामले की मजबूती पर निर्भर करता है, न कि अदालत के आदेश में किसी त्रुटि पर। यह टिप्पणी बनभूलपुरा हिंसा मामले के आरोपी अब्दुल मलिक को नैनीताल उच्च न्यायालय से मिली जमानत के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की अपील को खारिज करते हुए की गई। आरोप है कि 8 फरवरी 2024 को एक मस्जिद को गिराने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और सरकारी तथा निजी वाहनों में आग लगा दी।
भीड़ ने एक पुलिस थाने में भी आग लगाने का आरोप लगाया और पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके। यह भी कहा गया है कि हिंसा की योजना मलिक के घर पर बनाई गई थी। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने जमानत रद्द करने का अनुरोध करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने जमानत देने के कारण स्पष्ट नहीं किए।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, 'जमानत के ऐसे आदेशों पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है जिनमें विस्तृत कारण नहीं दिए गए हैं।' वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क किया कि बिना कारण बताए जमानत देने के आदेश उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों के खिलाफ हैं। न्यायाधीश ने कहा, 'उन निर्णयों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।'
उन्होंने राज्य पुलिस द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम लागू करने पर भी सवाल उठाया। इससे पहले, न्यायमूर्ति बागची ने चैतन्य बघेल को जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय और छत्तीसगढ़ सरकार की याचिकाएं खारिज करते हुए जमानत आदेशों को नियमित रूप से चुनौती देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की थी।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा था, 'एक निर्णय है जिसमें कहा गया है कि जमानत देते समय कारण बताने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन जमानत देने से इनकार करते समय कारण बताना आवश्यक है।' उन्होंने मौजूदा मामले का उल्लेख करते हुए सवाल किया, 'अगर कोई भीड़ पुलिस थाने को जला देती है, तो उस पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम कैसे लागू हो सकता है?' वरिष्ठ अधिवक्ता ने उत्तर दिया कि इससे लोक व्यवस्था प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे आरोपी को जमानत देने से पुलिसकर्मियों का मनोबल गिरता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, 'यदि आपको पुलिसकर्मियों के मनोबल की चिंता है, तो आपको दो वर्ष के भीतर आरोपी को दोषी साबित करना चाहिए था।'
उन्होंने कहा कि जमानत रद्द कराने के लिए विशेष अनुमति याचिका दाखिल करके अपनी विफलता पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। न्यायाधीश ने कहा कि लोक व्यवस्था और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत अपराध अलग-अलग विषय हैं और इस कड़े कानून के प्रावधानों को चुनौती दी जा सकती है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, 'किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अदालत के आदेश में हुई त्रुटि पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह अभियोजन पक्ष के मामले पर निर्भर करती है।'
