ईरान को एनपीटी में उपाध्यक्ष पद मिलने पर अमेरिका का विरोध
परमाणु अप्रसार संधि की बैठक का आगाज़
संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की एक महीने लंबी बैठक शुरू हो चुकी है। इस बैठक में 34 देशों के प्रतिनिधियों को उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया है, जिसमें ईरान का नाम भी शामिल है। अमेरिका के कड़े विरोध के बावजूद, ईरान को एनपीटी के भीतर उपाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ है। एनपीटी में हर पांच साल में एक अध्यक्ष और 34 उपाध्यक्ष चुने जाते हैं, और इस बार अध्यक्षता वियतनाम को मिली है, जो चीन और रूस के निकट संबंध रखता है।
अमेरिका का विरोध और ईरान का समर्थन
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने इस निर्णय को रोकने के लिए अंतिम क्षण तक प्रयास किए, लेकिन 121 देशों के समर्थन के चलते ईरान को यह पद मिल गया। ईरान का कहना है कि उसके नेता ने हमेशा परमाणु हथियारों के खिलाफ आवाज उठाई है और अमेरिका इस मुद्दे पर झूठ फैला रहा है।
अमेरिका का एनपीटी पर आरोप
अमेरिका ने इसे एनपीटी का अपमान बताया
परमाणु अप्रसार संधि के अध्यक्ष हेंग वियत के अनुसार, गुट निरपेक्ष देशों ने ईरान का समर्थन किया, जबकि यूएई और अमेरिका ने इसका विरोध किया, जो प्रभावी नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप, ईरान को उपाध्यक्ष का पद दिया गया।
अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण और अप्रसार ब्यूरो के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने इसे एनपीटी के लिए अपमानजनक बताया। उनके अनुसार, ईरान ने लंबे समय से परमाणु अप्रसार नीति के प्रति अपनी अवमानना दिखाई है, और ऐसे में उसका चयन शर्मनाक है।
केव ने कहा कि यह एक कलंकित निर्णय है, जो एनपीटी की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के दूत रजा नजाफी ने अमेरिका की नीयत पर सवाल उठाए।
नजाफी ने कहा कि अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने परमाणु हथियारों का उपयोग किया है, इसलिए उसे इस पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है।
परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का महत्व
परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी क्या है?
1970 में शीत युद्ध के दौरान परमाणु हमले के खतरे को देखते हुए एनपीटी की स्थापना की गई थी। यह संगठन यूएन की देखरेख में कार्य करता है, जिसका उद्देश्य दुनिया को परमाणु हमले से सुरक्षित रखना है। इस संधि के 190 से अधिक सदस्य देश हैं और इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
1. जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, वे इसे हासिल करने का प्रयास नहीं करेंगे।
2. जिन देशों के पास वर्तमान में परमाणु हथियार हैं, वे उसे कम करने की दिशा में काम करेंगे।
3. परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा।
