ईरान की इंटरनेट केबलों को निशाना बनाने की योजना से वैश्विक कनेक्टिविटी पर खतरा
ईरान की संभावित योजना से बढ़ी चिंताएँ
ईरान द्वारा फारस की खाड़ी में बिछी इंटरनेट केबलों को लक्षित करने की संभावित योजना ने वैश्विक डिजिटल कनेक्टिविटी को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के दो उच्च सुरक्षा अधिकारियों ने कहा है कि यदि अमेरिका और इजरायल ने फिर से ईरान पर हमला किया, तो तेहरान समुद्र के नीचे बिछे इन केबलों को निशाना बनाने की योजना बना रहा है। हालांकि, इन केबलों के क्षतिग्रस्त होने से पूरी दुनिया का इंटरनेट ठप होने की संभावना कम है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में इंटरनेट, ऑनलाइन भुगतान और क्लाउड सेवाओं पर कई सप्ताह तक असर पड़ सकता है।
समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों का महत्व
आज के समय में, अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों के माध्यम से गुजरता है। ये केबलें विभिन्न देशों को जोड़ती हैं और इनके जरिए वेबसाइट, वीडियो, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और क्लाउड सेवाओं का डेटा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचता है।
इन केबलों में बालों से भी पतले कांच के फाइबर होते हैं, जिनके माध्यम से प्रकाश संकेतों के रूप में डेटा का संचार होता है। दुनिया भर में ऐसी सैकड़ों केबलें बिछी हुई हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फारस की खाड़ी में मौजूद केबलों के कटने से पूरी दुनिया का इंटरनेट ठप हो जाएगा। टेलीकम्युनिकेशन रिसर्च फर्म TeleGeography के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ का हिस्सा वैश्विक स्तर पर एक प्रतिशत से भी कम है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में प्रमुख इंटरनेट केबलें
होर्मुज जलडमरूमध्य, ईरान और ओमान के बीच स्थित है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसके समुद्र तल के नीचे कई महत्वपूर्ण फाइबर-ऑप्टिक केबलें मौजूद हैं।
इनमें प्रमुख हैं:
- Asia-Africa-Europe 1 (AAE-1): यह केबल दक्षिण-पूर्व एशिया को मिस्र के माध्यम से यूरोप से जोड़ती है। इसके लैंडिंग पॉइंट संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर और सऊदी अरब में हैं।
- FALCON: यह नेटवर्क भारत और श्रीलंका को खाड़ी के देशों, सूडान और मिस्र से जोड़ता है।
- Gulf Bridge International: यह नेटवर्क खाड़ी क्षेत्र के विभिन्न देशों को जोड़ता है, जिनमें ईरान भी शामिल है।
इन नेटवर्कों के माध्यम से खाड़ी क्षेत्र में इंटरनेट कनेक्टिविटी और अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रांसफर को बनाए रखने में मदद मिलती है।
इंटरनेट केबलों के कटने पर संभावित प्रभाव
यदि समुद्र के नीचे बिछी एक केबल क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो आमतौर पर इंटरनेट ऑपरेटर डेटा को अन्य उपलब्ध नेटवर्क और वैकल्पिक मार्गों से भेज सकते हैं। इस कारण से, एक केबल के टूटने पर आम उपयोगकर्ताओं को बड़ा अंतर महसूस नहीं होता।
हालांकि, यदि एक साथ कई केबलें काट दी जाएं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में खाड़ी क्षेत्र के देशों में इंटरनेट की गति धीमी हो सकती है और डिजिटल सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
संभावित प्रभावों में शामिल हैं:
- इंटरनेट कनेक्टिविटी और डेटा ट्रांसफर की गति में कमी।
- ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल भुगतान में देरी या रुकावट।
- ई-कॉमर्स और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी सेवाओं पर असर।
- क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर से जुड़ी सेवाओं में व्यवधान।
- कंपनियों के ऑनलाइन कामकाज और संचार में परेशानी।
हालांकि, नुकसान की गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि ऑपरेटर कितनी तेजी से ट्रैफिक को अन्य नेटवर्क पर भेज पाते हैं।
भारत पर प्रभाव
भारत के लिए समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 17 सबमरीन केबलें 14 केबल लैंडिंग स्टेशनों से जुड़ी हैं। मुंबई और चेन्नई में ऐसे स्टेशनों की सबसे अधिक संख्या है।
यदि होर्मुज क्षेत्र में कई केबलें क्षतिग्रस्त होती हैं, तो भारत और खाड़ी देशों के बीच डेटा ट्रैफिक प्रभावित हो सकता है। हालांकि, इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय नेटवर्क ऑपरेटर डेटा को किन वैकल्पिक मार्गों से भेज पाते हैं।
इंटरनेट केबल की मरम्मत की चुनौतियाँ
समुद्र के नीचे टूटी इंटरनेट केबल की मरम्मत करना सामान्य तकनीकी कार्य नहीं है। इसके लिए विशेष जहाजों, प्रशिक्षित इंजीनियरों और समुद्री क्षेत्र में काम करने की अनुमति की आवश्यकता होती है।
मरम्मत की प्रक्रिया में सबसे पहले इंजीनियर फाइबर के भीतर प्रकाश संकेत भेजकर खराबी की जगह का पता लगाते हैं। इसके बाद विशेष मरम्मत जहाज केबल को समुद्र तल से ऊपर उठाता है। क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाकर नई केबल जोड़ी जाती है और फाइबर के सिरों को जोड़ने के बाद केबल को दोबारा समुद्र में उतार दिया जाता है।
अमेरिकी नौसेना के अधिकारी रियर एडमिरल माइक ब्रूक्स के अनुसार, 1,500 मीटर से कम गहरे पानी में जहाज के मौके पर पहुंचने के बाद मरम्मत में सामान्यतः एक से तीन दिन लगते हैं। लेकिन जहाज की उपलब्धता, मौसम और समुद्री क्षेत्र में काम करने की अनुमति मिलने में लगने वाला समय पूरी प्रक्रिया को लंबा कर सकता है।
युद्ध के दौरान मरम्मत की कठिनाइयाँ
सामान्य परिस्थितियों में भी समुद्र के नीचे केबल की मरम्मत में कई तरह की चुनौतियाँ आती हैं। लेकिन युद्ध के दौरान ये समस्याएँ और गंभीर हो सकती हैं।
- समुद्र में सैन्य गतिविधियों और बारूदी सुरंगों का खतरा बढ़ सकता है।
- मरम्मत जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है।
- दूसरे देशों के समुद्री क्षेत्र में काम करने की अनुमति मिलने में देरी हो सकती है।
- क्षतिग्रस्त केबलों की मरम्मत के लिए सीमित संख्या में जहाज उपलब्ध होंगे।
- युद्ध समाप्त होने के बाद भी समुद्र तल का दोबारा सर्वेक्षण करना पड़ सकता है।
इसका मतलब है कि यदि कई केबलें एक साथ क्षतिग्रस्त होती हैं, तो नेटवर्क को पूरी तरह बहाल होने में कई सप्ताह या उससे भी अधिक समय लग सकता है।
क्या सैटेलाइट इंटरनेट विकल्प हो सकता है?
सैटेलाइट संचार कुछ परिस्थितियों में वैकल्पिक कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सकता है, लेकिन यह समुद्र के नीचे बिछी केबलों का पूर्ण विकल्प नहीं है।
सबमरीन केबलें बहुत बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर कर सकती हैं। इसके मुकाबले सैटेलाइट नेटवर्क की क्षमता सीमित होती है और प्रति यूनिट डेटा ट्रांसफर की लागत भी अधिक हो सकती है। इसके अलावा, सैटेलाइट सेवाओं को भी जमीन पर मौजूद नेटवर्क और अन्य बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
इसलिए बड़े पैमाने पर केबल नेटवर्क बाधित होने पर सैटेलाइट सेवाएं कुछ मदद तो कर सकती हैं, लेकिन पूरे अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक को संभालना उनके लिए मुश्किल होगा।
अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्र के नीचे केबलों की सुरक्षा
समुद्र के नीचे बिछी संचार केबलों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।
1884 में पेरिस में समुद्री टेलीग्राफ केबलों की सुरक्षा से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत समुद्री क्षेत्र में केबल को जानबूझकर या लापरवाही से नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध बनाया गया।
इसके बाद 1982 में अपनाए गए संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) ने भी समुद्र के नीचे केबलों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित नियमों को आगे बढ़ाया।
UNCLOS के अनुच्छेद 113 के अनुसार, देशों को अपने ध्वज वाले जहाजों या अपने अधिकार क्षेत्र के लोगों द्वारा खुले समुद्र के नीचे बिछी केबलों को जानबूझकर या गंभीर लापरवाही से नुकसान पहुंचाने को दंडनीय अपराध बनाना चाहिए। अनुच्छेद 58 इन नियमों को विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) तक भी विस्तारित करता है।
ईरान की योजना और वैश्विक इंटरनेट पर खतरा
ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र की समुद्री इंटरनेट केबलों को निशाना बनाने की कथित योजना क्षेत्रीय डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए गंभीर चिंता पैदा करती है। फिर भी, केवल होर्मुज जलडमरूमध्य में केबलें कटने से दुनिया भर का इंटरनेट ठप होने की आशंका नहीं है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक के लिए कई वैकल्पिक मार्ग मौजूद हैं।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होगा, जब एक साथ कई महत्वपूर्ण केबलें क्षतिग्रस्त हों और युद्ध के कारण उनकी मरम्मत में लंबी देरी हो। ऐसी स्थिति में खाड़ी क्षेत्र में इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, क्लाउड सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
फिलहाल, ईरान की कथित योजना को लेकर सामने आई जानकारी अधिकारियों के बयानों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे क्या कार्रवाई होती है और वैश्विक नेटवर्क ऑपरेटर किस तरह वैकल्पिक कनेक्टिविटी का इस्तेमाल करते हैं।
