ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता में रुकावटें: क्या है कारण?

मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता में कई रुकावटें आ रही हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता के बेटे मोजतबा खामेनेई ने समझौते का समर्थन किया है, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास और विवादों के कारण वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही है। जानें क्या हैं मुख्य मुद्दे और इजरायल की चिंताएं इस जटिल स्थिति में।
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ईरान और अमेरिका के बीच तनाव


मध्य पूर्व में लंबे समय से चल रहे तनाव के बीच, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका के साथ संभावित समझौते और 60 दिनों के सीजफायर का समर्थन किया है। हालांकि, दोनों देशों के बीच शांति वार्ता अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। यह सवाल उठता है कि जब दोनों पक्ष युद्ध से बचना चाहते हैं, तो रुकावटें कहां हैं?


सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान दोनों ही आर्थिक और रणनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। अमेरिका नहीं चाहता कि मध्य पूर्व में कोई नया बड़ा युद्ध छिड़े, जबकि ईरान प्रतिबंधों और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। फिर भी, अविश्वास इतना गहरा है कि हर प्रस्ताव नए विवाद में उलझ जाता है।


सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले समुद्री नाकाबंदी हटाए और तेल निर्यात पर लगी बाधाओं को कम करे। दूसरी ओर, अमेरिका का कहना है कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दिखाता, तब तक दबाव कम नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि बातचीत आगे बढ़ने के बजाय बार-बार अटक जाती है।


परमाणु कार्यक्रम भी दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान कई वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन सीमित करे और अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में दे। लेकिन ईरान इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मानता है। तेहरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक जरूरतों के लिए है और वह किसी दबाव में झुकना नहीं चाहता।


रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर एकमत नहीं है। कुछ कट्टरपंथी गुट अमेरिका पर भरोसा करने के खिलाफ हैं, जबकि आर्थिक संकट से परेशान वर्ग चाहता है कि किसी भी तरह प्रतिबंधों में राहत मिले। मोजतबा खामेनेई के समझौते के पक्ष में होने की खबरों ने उम्मीद जरूर बढ़ाई है, लेकिन सत्ता के भीतर मतभेद अभी भी बने हुए हैं।


इजरायल भी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है। इजरायली नेतृत्व को चिंता है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई नरम समझौता होता है, तो ईरान क्षेत्र में और मजबूत हो सकता है। यही कारण है कि इजरायल इस डील को लेकर असहजता जता चुका है।


इसके अलावा, बातचीत के तरीके को लेकर भी दोनों देशों में बड़ा अंतर है। अमेरिकी नेतृत्व जल्दी नतीजा चाहता है, जबकि ईरान लंबी रणनीतिक बातचीत के जरिए हर शर्त पर विस्तार से चर्चा करना चाहता है। यही कारण है कि कई दौर की बातचीत के बाद भी अंतिम मसौदा तैयार नहीं हो पाया।


हालांकि, हाल की रिपोर्टों में यह संकेत मिले हैं कि दोनों पक्ष किसी बड़े टकराव से बचना चाहते हैं। तेल बाजार, होर्मुज मार्ग और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस समझौते को जल्द लागू होते देखना चाहता है। लेकिन जब तक परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भरोसेमंद समाधान नहीं निकलता, तब तक 60 दिनों का सीजफायर केवल कागजों पर ही रह सकता है।