इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर दहेज हत्या मामलों में जमानत देने का विवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया ने दहेज हत्या के मामलों में जमानत देने के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना का सामना किया है। जस्टिस भाटिया ने 510 मामलों में से 508 में जमानत दी, जिससे सवाल उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत आदेश को निराशाजनक बताते हुए उच्च न्यायालय के विवेक पर सवाल उठाए। इस मामले में जस्टिस भाटिया ने खुद को जमानत मामलों से अलग करने की अपील की है। जानें इस विवाद के पीछे की पूरी कहानी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर दहेज हत्या मामलों में जमानत देने का विवाद

जस्टिस पंकज भाटिया का जमानत आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में जस्टिस पंकज भाटिया ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी को जमानत दी थी। उन्होंने यह कहते हुए जमानत दी कि आरोपी 27 जुलाई 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, इसलिए वह जमानत का हकदार है। हालांकि, 9 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस जमानत को खारिज कर दिया। कोर्ट ने जमानत को निराशाजनक बताते हुए हाईकोर्ट के विवेक पर सवाल उठाए। इसके बाद जस्टिस भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट को एक आवेदन भेजकर खुद को जमानत मामलों से अलग करने की अपील की, यह कहते हुए कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने उन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। इस मामले में काफी हंगामा हुआ, यहां तक कि अवध बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट से जमानत संबंधी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने की मांग की।


दहेज हत्या के मामलों में जमानत का खुलासा

हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जस्टिस पंकज भाटिया ने अक्टूबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच दहेज प्रताड़ना से जुड़े 510 मामलों में सुनवाई की, जिनमें से 508 मामलों में उन्होंने जमानत दी। यह आंकड़ा 99% से अधिक है। सभी मामलों में जमानत के आदेश की भाषा और संरचना एक समान थी, भले ही मौत की परिस्थितियां भिन्न थीं।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय को अपराध की गंभीरता, सजा, आरोपी और मृतक के बीच संबंध, घटना स्थल और चिकित्सा साक्ष्यों की जांच करनी चाहिए थी। जस्टिस भाटिया ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश से जमानत मामलों की सूची न सौंपने का अनुरोध किया था।


दहेज हत्या की धाराएँ

दहेज हत्या की धाराएँ तब लागू होती हैं जब शादी के सात साल के भीतर महिला की अस्वाभाविक मौत होती है और दहेज उत्पीड़न का सबूत होता है। इस स्थिति में कोर्ट यह मानकर ट्रायल शुरू करता है कि दहेज के कारण हत्या हुई है।


जमानत आदेशों का विश्लेषण

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस भाटिया के जमानत आदेशों में अक्सर यह उल्लेख किया गया कि मृतक के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। अधिकांश मामलों में जमानत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आपराधिक रिकॉर्ड के अभाव के आधार पर दी गई।


जस्टिस भाटिया से संपर्क की कोशिश

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जस्टिस भाटिया से संपर्क करने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।