इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत याचिका पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया
अग्रिम जमानत याचिका पर अदालत का निर्णय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 82 के तहत किसी व्यक्ति को भगोड़ा घोषित करने का आदेश, उसकी अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करने में बाधा नहीं डालता।
इस संदर्भ में न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने मोनिका नामक महिला की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने गैर जमानती वारंट जारी होने से कुछ दिन पहले एक बच्चे को जन्म दिया था।
अदालत ने मंगलवार को दिए गए आदेश में कहा, "यह सही नहीं है कि सभी मामलों में अग्रिम जमानत के आवेदन पर विचार करने पर रोक है। मौजूदा मामले में, जब याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ प्रक्रियाएं चल रही थीं, तब वह गर्भवती थी और अदालत में पेश नहीं हो सकी। इसलिए, यह अदालत इस मामले में अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त मानती है।"
याचिकाकर्ता, जो पेशे से नर्स हैं, ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले में अग्रिम जमानत की मांग की थी।
आरोप है कि जिस अस्पताल में यह घटना हुई, वहां याचिकाकर्ता नर्स के रूप में कार्यरत थीं। शिकायतकर्ता के वकील ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से ही गैर जमानती वारंट और भगोड़ा घोषित करने का आदेश जारी किया जा चुका है।
वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता केवल एक नर्स थीं और सह-आरोपी की निगरानी में काम कर रही थीं, उनका घटना से कोई सीधा संबंध नहीं था।
भगोड़ा घोषित किए जाने के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आरोप पत्र नवंबर 2024 में दाखिल किया गया और मई 2025 में संज्ञान लिया गया। हालांकि, 10 अक्टूबर 2025 को जब गैर जमानती वारंट जारी किया गया, याचिकाकर्ता गर्भवती थीं और 6 अक्टूबर 2025 को उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया।
