इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय: सरकारी विभागों को देरी के लिए ठोस कारण बताने होंगे

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि सरकारी विभागों को मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम के तहत अपील में देरी के लिए ठोस कारण बताने होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल प्रशासनिक विलंब का हवाला देकर राहत नहीं मिल सकती। यह निर्णय रेल मंत्रालय की विशेष अपील को खारिज करते हुए दिया गया, जिसमें 28 दिन की देरी को माफ करने से इनकार किया गया। जानें इस फैसले के पीछे की पूरी कहानी और इसके प्रभाव।
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सरकारी विभागों के लिए नई दिशा-निर्देश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि सरकारी विभाग मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम के तहत अपील दायर करने में हुई देरी को माफ कराने के लिए केवल नौकरशाही प्रक्रियाओं या प्रशासनिक विलंब का हवाला नहीं दे सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार सरकार और निजी पक्षकार समान स्तर पर हैं, और इसलिए सरकारी विभागों को विलंब माफी के लिए ठोस और वास्तविक कारण प्रस्तुत करने होंगे। यह फैसला 13 जुलाई को सुरक्षित रखा गया था और 29 जुलाई को सुनाया गया, जिसे अब उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया है।


विशेष अपील का खारिज होना

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी रेल मंत्रालय की एक विशेष अपील को खारिज करते हुए की, जो लखनऊ की वाणिज्यिक अदालत के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। खंडपीठ ने वाणिज्यिक अदालत के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत आपत्तियां दाखिल करने में हुई 28 दिन की देरी को माफ करने से इनकार किया गया था। यह मामला मेसर्स गैलेंट इस्पात लिमिटेड और रेल मंत्रालय के बीच रेलवे साइडिंग के लिए आवंटित भूमि के पट्टा किराये से संबंधित विवाद का था।


मध्यस्थता निर्णय और उच्च न्यायालय की भूमिका

दिसंबर 2023 में एकल मध्यस्थ ने गैलेंट इस्पात के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रेलवे को पट्टा किराये में संशोधन करने और लगभग 1.79 करोड़ रुपये आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया था। रेल मंत्रालय ने इस मध्यस्थीय निर्णय को वाणिज्यिक अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका निर्धारित समय-सीमा के बाद दाखिल की गई। इस कारण अदालत ने देरी माफ करने का अनुरोध अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद रेल मंत्रालय ने उच्च न्यायालय का रुख किया।


अदालत का दृष्टिकोण

गैलेंट इस्पात लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने दलील दी कि रेल मंत्रालय देरी के लिए कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं कर सका, इसलिए उसे राहत नहीं दी जा सकती। उच्च न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए कहा कि न्यायालयों का यह दृष्टिकोण रहा है कि विलंब माफी ‘‘अपवाद है, नियम नहीं।’’ अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी विभागों को देरी के लिए वास्तविक, ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत करने होंगे, और वे केवल प्रशासनिक चूक या प्रक्रियागत विलंब का हवाला देकर राहत की उम्मीद नहीं कर सकते।