इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय: विवाह समारोहों में हर्ष फायरिंग पर रोक
अदालत का स्पष्ट निर्देश
प्रयागराज, तीन अगस्त: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि लाइसेंसी हथियारों का उपयोग विवाह समारोहों या धार्मिक आयोजनों में हर्ष फायरिंग के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ता ने लाइसेंस रद्द करने के आदेश को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने 767 कारतूसों का विवरण प्रस्तुत नहीं कर पाने के कारण रद्द किए गए शस्त्र लाइसेंस के खिलाफ अदालत में अपील की थी। अदालत ने 29 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कहा कि शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है, जो कानून और लाइसेंस की शर्तों के कड़ाई से पालन पर निर्भर करता है।
अदालत ने कहा, 'शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है और इसे इस विश्वास के साथ जारी किया जाता है कि लाइसेंसधारक इसकी सभी शर्तों का पालन करेगा।' मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता को वर्ष 2000 में शस्त्र लाइसेंस दिया गया था। वर्ष 2019 में निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने उससे खरीदे और इस्तेमाल किए गए कारतूसों का विवरण मांगा। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने वर्षों में 857 कारतूस खरीदे थे, लेकिन वह केवल 57 कारतूस और 33 खोखे ही प्रस्तुत कर सका।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शेष 767 कारतूस निशानेबाजी, शादी और छठ पूजा तथा दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल किए गए। इस स्पष्टीकरण से असंतुष्ट लाइसेंस प्राधिकारी ने शस्त्र अधिनियम की धारा 17 के तहत उसका लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि वर्ष 2000 में लाइसेंस जारी होने के समय इस्तेमाल किए गए कारतूसों का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य नहीं था। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि शस्त्र अधिनियम के प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि नियामकीय शर्तें लाइसेंस का अभिन्न हिस्सा हैं और उनका पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा, 'याचिकाकर्ता को लाइसेंसी हथियार का उपयोग हर्ष फायरिंग के लिए करने की अनुमति नहीं थी।'
विवाह और धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार हथियार का उपयोग कानून के अनुरूप नहीं है।
