इंदौर में दूषित जल संकट: प्रशासन की लापरवाही से 15 लोगों की मौत
इंदौर का जल संकट: गंभीर स्थिति का सामना
इंदौर, जो कि भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में से एक माना जाता है, के भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल संकट एक गंभीर समस्या बन गई है। यह समस्या एक दिन की गलती नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही अनदेखी और निर्माण में लापरवाही का परिणाम है। हाल ही में, छह दिनों में 15 लोगों की मौत ने जल आपूर्ति की खतरनाक स्थिति को उजागर किया।
स्थानीय निवासियों ने कई हफ्तों तक गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायत की, लेकिन प्रशासन ने इसे नजरअंदाज किया। स्थिति तब और बिगड़ गई जब 29 दिसंबर, 2025 को 100 से अधिक लोग उल्टी और दस्त जैसी बीमारियों से पीड़ित हो गए।
अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी, और अगले दिन आठ लोगों की मौत हो गई। बीमार लोगों की संख्या 1100 से अधिक हो गई। नगर निगम ने पानी के नमूनों की जांच के लिए भेजा और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की।
प्रशासन ने दो अधिकारियों को निलंबित किया और एक की सेवा समाप्त कर दी। जांच में यह सामने आया कि नर्मदा जल लाइन के ऊपर और आसपास ड्रेनेज चैंबर बनाए गए थे। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि एक पुलिस चौकी का टॉयलेट इसी पाइपलाइन के ऊपर बना हुआ था, जिससे सीवेज का पानी पेयजल में मिल सकता था।
यह लापरवाही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के संज्ञान में आई, जिसने शासन से रिपोर्ट मांगी। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इंदौर का दौरा किया, अस्पतालों का निरीक्षण किया और आपात बैठक बुलाई। मृतकों के परिवारों को दो लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की गई।
इस बीच, नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक विवादास्पद बयान वायरल हुआ, जिसके बाद उन्होंने खेद व्यक्त किया। नई साल की शुरुआत में आने वाली पानी की जांच रिपोर्ट ने स्थिति की भयावहता को उजागर किया। रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि लोग मल-मूत्र मिश्रित पानी पीने को मजबूर थे।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्री ने नगर निगम कमिश्नर और अतिरिक्त कमिश्नर को भी नोटिस जारी कर सख्त कदम उठाए।
हाई कोर्ट में प्रस्तुत स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने जितनी मौतें स्वीकार कीं, असल संख्या उससे कहीं अधिक थी। अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है, 2800 से अधिक लोग बीमार हुए हैं, और 201 मरीज विभिन्न अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं।
