आसाराम की स्वास्थ्य जांच के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन, उच्चतम न्यायालय का आदेश
उच्चतम न्यायालय का आदेश
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को स्वयंभू बाबा आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक को एक मेडिकल बोर्ड बनाने का निर्देश दिया है। आसाराम ने चिकित्सा कारणों से अंतरिम जमानत की मांग की है, जिस पर विचार करने के लिए अदालत ने यह आदेश जारी किया।
सुनवाई के दौरान की गई दलीलें
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि गठित मेडिकल बोर्ड को अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर अदालत में प्रस्तुत करनी होगी। इससे पहले, राजस्थान उच्च न्यायालय ने 27 मई को आसाराम की दोषसिद्धि और निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था।
आसाराम की यात्रा पर सवाल
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि आसाराम ने हाल ही में काशी विश्वनाथ और अयोध्या की यात्रा की थी। उन्होंने कहा कि उसे अंतरिम जमानत इस आधार पर मिली थी कि वह अचेत अवस्था में है, लेकिन अब वह सक्रिय है।
मेडिकल बोर्ड की आवश्यकता
पीठ ने स्पष्ट किया कि वे नियमित जमानत नहीं दे रहे हैं। अदालत ने कहा कि चिकित्सा आधार पर जमानत की आवश्यकता है या नहीं, इस पर निर्णय लेने से पहले मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आना आवश्यक है।
आसाराम के वकील का सुझाव
आसाराम के वकील ने सुझाव दिया कि मामले को एम्स के निदेशक के पास भेजा जा सकता है, जो विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड गठित कर सकते हैं। यह बोर्ड यह तय करेगा कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता है या नहीं।
उच्च न्यायालय का निर्णय
राजस्थान उच्च न्यायालय ने आसाराम की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उसे नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उसकी दोषसिद्धि कायम रही, जिसके कारण उसकी उम्रकैद की सजा बनी रही।
कानूनी प्रावधानों के तहत दोषसिद्धि
उच्च न्यायालय ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत आसाराम की दोषसिद्धि को भी बरकरार रखा। इससे पहले, 25 अप्रैल 2018 को एक निचली अदालत ने आसाराम को एक नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
