आरबीआई की नई पहल: प्लास्टिक नोटों का आगमन
आरबीआई प्लास्टिक मुद्रा नोटों की योजना
बारिश में कागजी नोटों का भीगना, जल्दी फटना और गंदे नोटों से होने वाली परेशानियों का सामना अब जल्द ही समाप्त हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) एक बार फिर प्लास्टिक आधारित, यानी पॉलीमर नोटों को लाने की योजना बना रहा है। यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीयों के हाथों में ऐसे नोट होंगे जो मौजूदा कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत, टिकाऊ और सुरक्षित होंगे।
पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट
आरबीआई इस महत्वाकांक्षी योजना को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है। इन नोटों की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि ये पानी, नमी, धूल और सामान्य घिसावट से प्रभावित नहीं होंगे। इससे नोटों की उम्र बढ़ेगी और नए नोटों की छपाई की आवश्यकता कम होगी। पॉलीमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक से बने होते हैं, जो पारंपरिक कागज के नोटों की तुलना में अधिक मजबूत और लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
14 साल पुरानी योजना का पुनरुद्धार
आरबीआई पहली बार पॉलीमर नोटों पर चर्चा नहीं कर रहा है। 2012 में भी इस दिशा में पहल की गई थी, जब 10 रुपये के पॉलीमर नोटों का परीक्षण कुछ शहरों में करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, तकनीकी चुनौतियों के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब, लगभग 14 वर्ष बाद, इस परियोजना को फिर से सक्रिय करने की तैयारी की जा रही है।
तकनीकी सुधारों से बढ़ी उम्मीदें
पिछले कुछ वर्षों में बैंकिंग तकनीक और नकदी प्रबंधन प्रणाली में काफी बदलाव आया है। नई पीढ़ी के एटीएम और कैश हैंडलिंग मशीनें स्थापित की गई हैं, जो आधुनिक मुद्रा प्रणाली के अनुरूप काम करने में सक्षम हैं। आरबीआई का मानना है कि अब तकनीकी बाधाएं पहले की तुलना में कम हो गई हैं।
नकदी की बढ़ती मांग
देश में डिजिटल भुगतान के बढ़ते उपयोग के बावजूद नकदी की मांग भी लगातार बढ़ रही है। 15 मई 2026 तक, देश में प्रचलन में कुल मुद्रा 42.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 11.5 प्रतिशत अधिक है।
नोट छापने पर बढ़ता खर्च
आरबीआई और सरकार को हर साल नए नोट छापने पर भारी खर्च करना पड़ता है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में मुद्रा छपाई पर लगभग 6,372 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यदि पॉलीमर नोट लागू होते हैं, तो नोटों की आयु बढ़ने से सरकार के खर्च में कमी आ सकती है।
100 और 500 रुपये के नोटों की समस्या
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 100 रुपये और 500 रुपये के नोट जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलीमर नोटों के उपयोग से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
छोटे नोटों की कमी
देश में 10 रुपये और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की मांग बनी रहती है। यदि पॉलीमर नोट लागू किए जाते हैं, तो छोटे मूल्यवर्ग के नोट अधिक समय तक चल सकेंगे।
दुनिया भर में पॉलीमर नोटों का प्रयोग
भारत अकेला देश नहीं होगा जो पॉलीमर नोटों का उपयोग करेगा। लगभग 60 देशों में पहले से ही पॉलीमर नोटों का प्रयोग किया जा रहा है।
नकली नोटों पर नियंत्रण
पॉलीमर नोटों की उन्नत सुरक्षा प्रणाली नकली नोटों के प्रसार को रोकने में मदद कर सकती है।
जल्द मिल सकते हैं नए नोट
यदि आरबीआई का पायलट प्रोजेक्ट सफल होता है, तो भारत में पॉलीमर नोटों का व्यापक उपयोग शुरू हो सकता है।
