आम आदमी पार्टी में उठापटक: राघव चड्ढा और पूर्व नेताओं की कहानी
राघव चड्ढा और पार्टी के भीतर की उथल-पुथल
आम आदमी पार्टी और उसके सांसद राघव चड्ढा के बीच की तकरार अब खुलकर सामने आ गई है। इस विवाद ने पार्टी के भीतर चल रही उथल-पुथल को एक बार फिर उजागर किया है। राघव चड्ढा ने पार्टी के निर्णय पर सीधे प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, 'मेरी चुप्पी को मेरी हार मत समझ लेना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।' आइए जानते हैं कि इस पार्टी से जुड़े प्रमुख नाम कब और क्यों अलग हुए।
प्रशांत भूषण, जो आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक थे, ने पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि पार्टी एक व्यक्ति केंद्रित है और इसमें आंतरिक लोकतंत्र तो है, लेकिन स्वराज नहीं है। भूषण ने पार्टी फंड की जांच के लिए एथिक्स कमेटी की मांग भी की थी। उनके पिता, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने पार्टी की स्थापना के समय एक करोड़ का चंदा दिया था, लेकिन बाद में वे पार्टी से अलग हो गए।
शाजिया इल्मी ने भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप लगाते हुए 2015 में पार्टी छोड़ दी थी। उन्होंने 2014 में गाजियाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गईं। इसके बाद उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली।
योगेंद्र यादव ने कहा कि आम आदमी पार्टी का गठन भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन के बाद हुआ था। उन्होंने पार्टी के कार्य करने के तरीके को अन्य राजनीतिक दलों के समान बताया और अपनी अलग पार्टी स्वराज अभियान बनाई।
कुमार विश्वास ने 2012 में अन्ना आंदोलन से जुड़कर राजनीति में कदम रखा। उन्होंने कहा कि उन्हें पार्टी में गलत कामों का विरोध करने के कारण किनारे किया गया।
कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिसमें उन्होंने केजरीवाल को मंत्री सत्येंद्र जैन से पैसे लेते देखा था। इसके बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया।
स्वाति मालीवाल ने भी पार्टी के एक नेता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद उस नेता को गिरफ्तार किया गया।
राघव चड्ढा और केजरीवाल के बीच की दूरियां तब से बढ़ने लगीं जब केजरीवाल जेल में थे और चड्ढा लंदन में छुट्टियां मना रहे थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चड्ढा हाल के समय में पार्टी के मुद्दों पर चुप रहे हैं।
विपक्ष इसे पार्टी के अंदरूनी मतभेद का संकेत मानता है, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेता इसे सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया बताते हैं।
राघव चड्ढा ने कहा कि वह संसद में जनता के मुद्दे उठाते रहेंगे और उनकी चुप्पी को हार नहीं समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कि खाने की कीमतें और डिलीवरी कर्मचारियों की चुनौतियां।
उन्होंने तर्क दिया कि ये मुद्दे जनता के हित में हैं और सवाल उठाया कि इन्हें उठाने से पार्टी को कैसे नुकसान हो सकता है। पार्टी ने हाल ही में अशोक कुमार मित्तल को उच्च सदन में नए उपनेता के रूप में नियुक्त किया है।
