असम में महिलाओं के सशक्तिकरण और अवैध कब्जों के खिलाफ सख्त कार्रवाई

असम में चुनावी वर्ष के आगमन के साथ, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण और अवैध कब्जों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। महिला आत्मनिर्भरता कार्यक्रम के तहत 15 लाख महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है, जबकि अवैध अतिक्रमण के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की जा रही है। यह दोनों पहल आगामी विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जानें कैसे ये कदम असम की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
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असम में महिलाओं के सशक्तिकरण और अवैध कब्जों के खिलाफ सख्त कार्रवाई

असम सरकार की नई पहल

असम में चुनावी वर्ष से पहले, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार ने दो महत्वपूर्ण मोर्चों पर स्पष्ट संकेत दिए हैं। एक तरफ, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में अभूतपूर्व कदम उठाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर, जंगलों और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ प्रशासनिक सख्ती दिखाई गई है। राज्य सरकार ने महिला आत्मनिर्भरता कार्यक्रम के तहत लगभग 15 लाख महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रारंभिक पूंजी प्रदान की है। इसका लक्ष्य है कि आने वाले महीनों में यह संख्या 40 लाख तक पहुंचाई जाए। इस योजना के तहत प्रत्येक महिला को प्रारंभ में 10,000 रुपये दिए जा रहे हैं, ताकि वे छोटे व्यवसाय, कृषि, पशुपालन, दुकान, सिलाई या अन्य स्वरोजगार गतिविधियों की शुरुआत कर सकें। सरकार का दावा है कि यह केवल सहायता नहीं है, बल्कि महिलाओं को स्थायी आय के रास्ते पर लाने का प्रयास है। सफल महिलाओं को कम ब्याज पर बड़े ऋण देने की व्यवस्था भी की गई है।


महिला सशक्तिकरण का व्यापक प्रभाव

यह अभियान राज्य के सभी जिलों में लागू किया गया है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की रीढ़ मानते हुए कह रही है कि इससे घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा।


अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई

इसके साथ ही, राज्य सरकार ने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई को तेज कर दिया है। हाल ही में होजाई जिले में 5,000 से अधिक बिगहा रिजर्व फॉरेस्ट भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। प्रशासन का कहना है कि यह भूमि वर्षों से अवैध कब्जे में थी और वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा रही थी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जंगल और सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा सहन नहीं किया जाएगा।


सख्त कार्रवाई का राजनीतिक संदर्भ

राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में एक लाख से अधिक बिगहा सरकारी और वन भूमि को खाली कराया गया है। सोनीटपुर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर अवैध बस्तियों को हटाया गया है। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी है कि अवैध कब्जाधारकों के लिए असम में कोई स्थान नहीं है।


असम की राजनीतिक ध्रुवीकरण

असम की राजनीति इस समय दो स्पष्ट ध्रुवों पर खड़ी है: एक ओर कल्याण और सशक्तिकरण की राजनीति, और दूसरी ओर कठोर शासन और पहचान की राजनीति। इन दोनों का केंद्र आगामी विधानसभा चुनाव है। महिला स्वरोजगार योजना असम की राजनीति में एक महत्वपूर्ण वोट बैंक रणनीति है। महिला मतदाता न केवल संख्या में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे घर और समाज के निर्णयों को भी प्रभावित करती हैं। जब सरकार सीधे उन्हें पूंजी प्रदान करती है, तो यह केवल वित्तीय सहायता नहीं होती, बल्कि यह सम्मान, विश्वास और भविष्य की उम्मीद भी देती है। 40 लाख महिलाओं तक पहुंचने का लक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाना चाहती है।


अतिक्रमण विरोधी अभियान का महत्व

असम की राजनीति केवल कल्याण योजनाओं पर निर्भर नहीं करती। पहचान, भूमि और संसाधन यहां के संवेदनशील मुद्दे हैं। जब सरकार हजारों बिगहा भूमि को खाली कराती है और अवैध कब्जाधारकों को भागने के लिए कहती है, तो यह केवल कानून का पालन नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं की उस भावना को छूती है जो वर्षों से असुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलाव के डर से बनी है।


निर्णायक शासन की छवि

यह सख्ती विशेष रूप से उन मतदाताओं को संदेश देती है जो मानते हैं कि पूर्व की सरकारें इस मुद्दे पर कमजोर थीं। वर्तमान नेतृत्व खुद को निर्णायक और निडर साबित करना चाहता है। चुनावी राजनीति में यह छवि अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। चुनाव नजदीक आते ही ये दोनों अभियान और तेज हो गए हैं। एक ओर महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देकर विश्वास जीता जा रहा है, दूसरी ओर सख्त कार्रवाई से यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार स्थानीय हितों की रक्षा में कोई समझौता नहीं करेगी।


आगामी विधानसभा चुनाव का महत्व

आगामी विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि क्या असम की जनता इस आक्रामक और स्पष्ट शासन शैली को समर्थन देती है या नहीं। फिलहाल संकेत स्पष्ट हैं कि सरकार ने चुनावी मैदान में उतरने से पहले अपने हथियार धारदार कर लिए हैं।