असम की पारंपरिक चित्रकला को मिला राष्ट्रीय मान्यता
असम की सांस्कृतिक धरोहर का नया अध्याय
Sanchipat Puthi Chitra
नगांव, 31 अगस्त: असम की समृद्ध और सदियों पुरानी चित्रित पांडुलिपि कला को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण मान्यता मिली है। कलाकार सुजीत दास की 'दशावतार' को 65वें राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी, 2026 में शामिल किया गया है, जो नई दिल्ली में ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित की जा रही है।
असम की पारंपरिक संचित पुथी चित्र का इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रदर्शनी में पहली बार शामिल होना असम की सांस्कृतिक और कलात्मक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह कला कार्य संचित पर बनाया गया है, जो अगार वृक्ष की छाल से तैयार की गई पारंपरिक लेखन और चित्रण सामग्री है। इसमें हेंगुल, हैतल, ढोलमती और नील जैसे पारंपरिक रंगों का उपयोग किया गया है। यह कार्य भगवान विष्णु के दस अवतारों को असम की पारंपरिक पुथी चित्र की विशिष्ट दृश्य भाषा में दर्शाता है। इसके रेखांकन, रचनाएँ, सजावटी तत्व और कथा दृष्टिकोण असम की चित्रित पांडुलिपि परंपरा से जुड़ी कलात्मक धरोहर को दर्शाते हैं।
इस प्रदर्शनी का उद्घाटन समारोह 21 अगस्त को नई दिल्ली के रवींद्र भवन में ललित कला आर्ट गैलरी में आयोजित किया गया था। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव विवेक अग्रवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव केके मिश्रा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया, जबकि प्रसिद्ध कलाकार पीआर दारोज भी इस अवसर पर मौजूद थे।
असम की पुथी चित्र की यात्रा, इसकी पारंपरिक सांस्कृतिक जड़ों से लेकर भारत की सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी तक, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरू की गई सांस्कृतिक आंदोलन ने साहित्य, पांडुलिपि संस्कृति और विभिन्न दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं के विकास के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार किया। ऐसे परंपराओं का संरक्षण और निरंतरता आधुनिक युग में अत्यधिक सांस्कृतिक महत्व रखती है।
कलाकार सुजीत दास पिछले 25 वर्षों से असम की पारंपरिक पुथी चित्र के संरक्षण, दस्तावेजीकरण, अभ्यास और शिक्षण में लगे हुए हैं। उनके निरंतर प्रयासों ने इस अपेक्षाकृत कम ज्ञात कला परंपरा को व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाने में मदद की है।
