अमेरिका-ईरान वार्ताओं में अविश्वास का नया दौर
अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण वार्ताएं
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक वार्ताएं एक बार फिर गंभीर अविश्वास के दौर में प्रवेश कर गई हैं। दोनों देशों के बीच युद्धविराम, परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों पर कई बार चर्चा हुई है, लेकिन बार-बार बदलते बयानों और शर्तों ने तनाव को और बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर 'रुख बदलने' और 'समझौते से पीछे हटने' के आरोप लगाए हैं।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को सीमित करे। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि अमेरिका लगातार नई शर्तें जोड़ रहा है और प्रतिबंध हटाने के वादे को स्पष्ट रूप से लागू नहीं कर रहा। इसी कारण, दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
हाल ही में अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया था कि समझौता 'करीब' है और कुछ ही दिनों में अंतिम रूप ले सकता है। लेकिन ईरान ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अभी भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने जमे हुए ईरानी फंड और प्रतिबंधों के मुद्दे पर स्पष्ट कदम नहीं उठाए, तो संभावित युद्धविराम समझौता भी रद्द हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बातचीत में सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों का एक-दूसरे पर भरोसा न कर पाना है। अमेरिका को आशंका है कि ईरान भविष्य में फिर से परमाणु गतिविधियां तेज कर सकता है, जबकि ईरान का आरोप है कि वॉशिंगटन पहले भी कई बार समझौतों से पीछे हट चुका है। यही कारण है कि हर नई वार्ता के बाद उम्मीद बनने के साथ-साथ अनिश्चितता भी बढ़ जाती है।
मध्य-पूर्व की स्थिति को देखते हुए यह विवाद केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों के कारण पूरी दुनिया की नजर इन वार्ताओं पर बनी हुई है। हाल में संभावित समझौते की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी देखी गई, जिससे यह स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इन वार्ताओं से सीधे प्रभावित हो रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि दोनों देश लगातार बदलते रुख और सार्वजनिक बयानबाजी से बचकर गंभीर कूटनीतिक संवाद पर ध्यान दें, तभी स्थायी समाधान संभव हो पाएगा। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि बातचीत जारी रहने के बावजूद भरोसे का संकट और गहरा होता दिखाई दे रहा है।
