अंतिम संस्कार की परंपरा: मृत व्यक्ति के पैरों को छूने का महत्व
अंतिम संस्कार की परंपरा

अंतिम संस्कार की परंपरा: सनातन धर्म में 16 संस्कारों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से एक दाह संस्कार है। मृत्यु के बाद व्यक्ति का अंतिम संस्कार करना आवश्यक होता है। धर्म शास्त्रों में इस प्रक्रिया से संबंधित कई नियम और परंपराएं बताई गई हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण परंपरा मृत व्यक्ति के पैरों को छूने की है, जिसे परिवार के छोटे सदस्य करते हैं।
कई लोग यह जानने के इच्छुक होते हैं कि मृतक के पैरों को छूने का क्या कारण है। आइए, इस परंपरा के पीछे के तर्क को समझते हैं।
संस्कार और परंपरा
मृतक के पैरों को छूने का उद्देश्य उसके प्रति अंतिम सम्मान और आभार व्यक्त करना होता है। इस क्रिया के माध्यम से परिवार के सदस्य मौन में धन्यवाद अर्पित करते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि मृतक के प्रति सम्मान का भाव है। सनातन धर्म में बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा भी है, जो मृतक के पैरों को छूने के पीछे का कारण बनती है।
मृत व्यक्ति से लिया जाता है आशीर्वाद
यह क्रिया मृतक को अंतिम विदाई देने का एक तरीका है। मृत्यु के बाद, मृतक की आत्मा एक नए सफर पर निकलती है। अंतिम बार उसके पैरों को छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि इससे मानसिक शांति मिलती है। जीवन में किसी प्रिय व्यक्ति को खोने का दुख अत्यंत गहरा होता है।
इस दुख को कम करने और अंतिम क्षणों में सुकून पाने के लिए मृतक के पैरों को छूना एक महत्वपूर्ण क्रिया है। इसके साथ ही, अंतिम बार मृतक का चेहरा देखना भी आवश्यक होता है, जिससे सच्चाई को स्वीकारने में साहस मिलता है और दर्द को कम करने में मदद मिलती है।
