शिवसेना (उबाठा) ने सांसदों के विलय को चुनौती दी, उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर

शिवसेना (उबाठा) ने अपने छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दी गई मंजूरी को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने मामले का उल्लेख करते हुए पीठ से सुनवाई की अपील की। इस मामले में प्रधान न्यायाधीश ने प्रतिक्रिया दी कि वे इसे देखेंगे। जानें इस राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित प्रभाव।
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उच्चतम न्यायालय में याचिका

शिवसेना (उबाठा) ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसमें उन्होंने अपने छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा दी गई मंजूरी को चुनौती दी।


इस मामले की सुनवाई के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख किया।


कामत ने पीठ से अनुरोध किया कि इस याचिका को बुधवार के लिए सुनवाई में शामिल किया जाए।


प्रधान न्यायाधीश का प्रतिक्रिया

इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "हम देखेंगे।"


कामत ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने 18 जुलाई को शिवसेना (उबाठा) के छह सांसदों के शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी।


उन्होंने यह भी कहा, "अध्यक्ष ने इन छह सांसदों के विलय को मान्यता दी है।" कामत ने यह तर्क दिया कि यह एक नया चलन बन गया है, जिसमें सांसद उन दलों में शामिल हो रहे हैं जिनके खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ा था।


सांसदों की संख्या में वृद्धि

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इन छह सांसदों के शामिल होने से लोकसभा में शिवसेना के सदस्यों की संख्या 13 हो गई है।


शिवसेना (उबाठा) के टिकट पर कुल नौ सांसद निर्वाचित हुए थे, जिनमें से छह अब शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं।


शिवसेना (उबाठा) ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष यह दलील दी थी कि बागी सांसदों को दल-बदल निरोधक कानून के तहत अयोग्य ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि उनका दल परिवर्तन इसी कानून के अंतर्गत आता है।