भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसदों को शामिल कर राज्यसभा उपचुनाव में उतारा
भाजपा का नया कदम
कोलकाता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तृणमूल कांग्रेस के तीन पूर्व राज्यसभा सदस्यों, सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बराइक को पार्टी में शामिल करने के तुरंत बाद उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार घोषित किया है। यह कदम इस बात का संकेत है कि सत्तारूढ़ पार्टी अब राज्य की राजनीति में विपक्ष के कुछ प्रमुख नेताओं को अपने साथ लाकर संगठन का विस्तार करने और अपनी स्थिति को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
तृणमूल के पूर्व नेताओं का भाजपा में प्रवेश
यह पहली बार है जब भाजपा ने विधानसभा चुनाव में मिली भारी जीत के बाद तृणमूल के पूर्व नेताओं को अपने दल में शामिल किया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चुनाव के बाद तृणमूल नेताओं के प्रवेश पर लगाया गया अनौपचारिक प्रतिबंध उन नेताओं पर लागू नहीं होगा जिन्हें भाजपा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त मानती है। सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बराइक ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल की हार के बाद राज्यसभा की सदस्यता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया था और अब वे लगभग एक महीने बाद भाजपा के टिकट पर फिर से संसद पहुंचने के लिए तैयार हैं।
भाजपा की नीति में बदलाव नहीं
भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इन नेताओं के शामिल होने को एक असाधारण मामला बताया और कहा कि इससे पार्टी की पूर्व नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा के दरवाजे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तृणमूल नेताओं के लिए बंद हैं, लेकिन जो नेता भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग में शामिल नहीं रहे, उनका पार्टी में स्वागत है। इस कदम के जरिए भाजपा ने विपक्षी नेताओं को यह संदेश दिया है कि राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नेताओं को पार्टी में न केवल स्थान मिलेगा, बल्कि उन्हें सम्मानजनक पहचान भी दी जाएगी।
राज्यसभा उपचुनाव की प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के अनुसार, राज्यसभा की तीनों रिक्त सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव होंगे, और प्रत्येक सीट को स्वतंत्र चुनाव माना जाएगा। हालांकि, तीनों उपचुनाव एक ही कार्यक्रम के तहत आयोजित किए जाएंगे। पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 207 विधायक हैं, जिससे पार्टी प्रत्येक सीट पर अपने दम पर जीत हासिल करने की मजबूत स्थिति में है। इसके विपरीत, विपक्ष की स्थिति कमजोर है, और यदि ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट एक साथ आ भी जाएं, तो भी उनके पास मिलाकर केवल 80 विधायक हैं।
तृणमूल कांग्रेस की स्थिति
चूंकि तीनों सीटों का चुनाव अलग-अलग कराया जा रहा है, इसलिए हर सीट पर जीत के लिए अलग-अलग बहुमत की आवश्यकता होगी। भाजपा के पास अपने दम पर पर्याप्त विधायक हैं, जबकि विपक्ष के पास किसी एक सीट के लिए भी पर्याप्त संख्या नहीं है। इसी कारण भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ तृणमूल के तीनों पूर्व सांसदों को मैदान में उतार सकी। विधानसभा चुनाव में हार के कुछ ही सप्ताह बाद तृणमूल के तीन वरिष्ठ सांसदों के पार्टी छोड़ने से यह धारणा बनी है कि तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक दबाव का सामना कर रही है।
तृणमूल का प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए तृणमूल के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने कहा कि ये सीटें तृणमूल कांग्रेस की थीं और चुनाव के बाद पार्टी छोड़ने वालों का फैसला बंगाल की जनता करेगी, क्योंकि इतिहास गद्दारों के प्रति कभी उदार नहीं रहा। वहीं भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि विधानसभा चुनाव ने बंगाल की राजनीति की तस्वीर बदल दी है और जो अनुभवी व बेदाग नेता बंगाल के पुनर्निर्माण में योगदान देना चाहते हैं, उनके लिए भाजपा में जगह है। इस घटनाक्रम की तुलना ओडिशा से भी की जा रही है, जहां भाजपा ने बीजू जनता दल के पूर्व राज्यसभा सदस्यों को अपनी पार्टी में शामिल कर उपचुनाव के जरिए उन्हें फिर संसद पहुंचाया था।
