पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में विभाजन: क्या ममता बनर्जी की सरकार संकट में है?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस में विभाजन के बाद ममता बनर्जी की सरकार संकट में आ गई है। विद्रोही विधायक रितब्रत बनर्जी ने नेता प्रतिपक्ष बनने का दावा किया है, जबकि पार्टी नेतृत्व ने सोवंदेब चट्टोपाध्याय को यह पद सौंपा था। विधायकों की गैरहाजिरी और हस्ताक्षर विवाद ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। क्या तृणमूल कांग्रेस इस संकट को संभाल पाएगी? जानें पूरी जानकारी इस लेख में।
 | 
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में विभाजन: क्या ममता बनर्जी की सरकार संकट में है? gyanhigyan

तृणमूल कांग्रेस में बड़ा भूचाल

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति में आज एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब तृणमूल कांग्रेस में विभाजन हो गया। कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के इस्तीफे के साथ, पार्टी का लंबे समय से चला आ रहा शासन समाप्त हो गया। निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी ने विधानसभा में प्रवेश कर नेता प्रतिपक्ष बनने का दावा किया और 59 विधायकों का समर्थन होने का दावा किया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने उनके दावे को मान्यता देते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष कक्ष की चाबियां सौंप दीं।


रितब्रत बनर्जी का दावा

रितब्रत बनर्जी ने कहा कि तृणमूल विधायक दल में 58 विधायक हैं, जिन्होंने पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीत हासिल की है। उन्होंने यह भी कहा कि दो अन्य विधायक उनके साथ जुड़ सकते हैं। जावेद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा को उपनेता के रूप में नियुक्त किया गया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वे बंगाल सरकार की उन नीतियों का विरोध करेंगे, जो उन्हें गलत लगती हैं।


तृणमूल नेतृत्व का निर्णय

तृणमूल नेतृत्व ने सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का निर्णय लिया था, लेकिन विद्रोही गुट ने इसे मानने से इनकार कर दिया। विद्रोही विधायकों ने एक पत्र में ममता बनर्जी को दल का नेता, रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष और अन्य को उपनेता घोषित किया। 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के पास 80 विधायक हैं, और विद्रोही गुट का दावा है कि उनके पास दो तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है।


विधायकों की गैरहाजिरी का मुद्दा

चुनाव परिणामों के बाद यह विवाद बढ़ा। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की सरकार बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस में विधायकों की गैरहाजिरी चर्चा का विषय बन गई। ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में 80 में से 71 विधायक उपस्थित थे, लेकिन यह संख्या घटकर 20 रह गई। यह असंतोष की ओर इशारा करता है।


हस्ताक्षर विवाद और निष्कासन

रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत की कि नेता प्रतिपक्ष नियुक्ति पत्र पर उनके हस्ताक्षर जाली हैं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया। संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व पर आरोप लगाया कि वे नैतिकता की बात करने वालों को बाहर निकालते हैं।


अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर सवाल

विद्रोही गुट ने ममता बनर्जी पर सीधा हमला नहीं किया, बल्कि अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका पर सवाल उठाए। रितब्रत बनर्जी ने कहा कि ममता बनर्जी अब भी उनकी नेता हैं, लेकिन अभिषेक की संवैधानिक हैसियत पर सवाल उठाए।


राजनीतिक विश्लेषकों की राय

विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष केवल नेता प्रतिपक्ष पद का विवाद नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर उत्तराधिकार की लड़ाई का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में अभिषेक बनर्जी पार्टी के प्रभावशाली नेताओं में उभरे हैं, जिससे पुराने नेताओं में असंतोष बढ़ा है।


महाराष्ट्र की राजनीति से तुलना

विश्लेषकों ने इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र की राजनीति से की है, जहां एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विद्रोह ने शिवसेना को तोड़ दिया था। ममता बनर्जी ने कहा कि पुलिस विधायकों को डराकर पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने इसे तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट बताया है।


भविष्य की अनिश्चितता

हस्ताक्षर विवाद की जांच तेज हो गई है, और कई विधायकों ने कहा है कि प्रस्ताव पत्र पर बने हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। इस मामले में अभिषेक बनर्जी को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया है। यह संकट पश्चिम बंगाल की राजनीति में और गंभीर हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या तृणमूल कांग्रेस इस विद्रोह को संभाल पाएगी या पार्टी में स्थायी विभाजन होगा।