कर्नाटक में मुख्यमंत्री शिवकुमार के लिए असंतोष की नई चुनौतियाँ
कर्नाटक सरकार में असंतोष का बढ़ता संकट
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए सरकार के भीतर असंतोष को नियंत्रित करना एक कठिन कार्य बनता जा रहा है। हाल ही में वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी की बगावत का मामला सुलझा था, लेकिन अब कर्नाटक सरकार में नए विवादों के संकेत मिल रहे हैं। कैबिनेट में विभागों के बंटवारे से असंतुष्ट दो प्रमुख नेता अचानक दिल्ली पहुंच गए हैं। इनमें नवनियुक्त बेंगलुरु विकास मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा शामिल हैं, जिन्होंने विभाग आवंटित होने के बावजूद अभी तक औपचारिक रूप से कार्यभार नहीं संभाला है। उनके साथ कांग्रेस विधायक रिज़वान अरशद भी हैं, जो कैबिनेट में जगह न मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं.
कृष्णा बायरे गौड़ा की मांगें
सूत्रों के अनुसार, कृष्णा बायरे गौड़ा पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं कि बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) और बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (BMRDA) को बेंगलुरु विकास पोर्टफोलियो के अंतर्गत लाया जाए। उनका मानना है कि इन एजेंसियों पर नियंत्रण के बिना विभाग के पास सीमित अधिकार होंगे, जबकि ये एजेंसियां बेंगलुरु और उसके आसपास के क्षेत्रों में योजना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस स्थिति ने नई चर्चा को जन्म दिया है कि क्या सरकार पोर्टफोलियो बंटवारे के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार कर सकती है।
रिज़वान अरशद की लॉबिंग
दिल्ली में राजनीतिक हलचल के बीच, कांग्रेस विधायक रिज़वान अरशद भी कैबिनेट में स्थान पाने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। इन नेताओं की समानांतर कोशिशों ने यह संकेत दिया है कि सरकार बनने के बावजूद कई लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं, जिससे शिवकुमार के लिए अपनी सरकार को स्थिर करने में नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो गई हैं।
रेड्डी का मामला और उसके परिणाम
हालांकि रामलिंगा रेड्डी का मामला सुलझ गया है, लेकिन नए घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। रेड्डी ने बेंगलुरु विकास विभाग से संबंधित आश्वासनों को पूरा न करने का आरोप लगाते हुए 'मेजर एंड मीडियम इरिगेशन' पोर्टफोलियो से इस्तीफा दिया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें केवल बेंगलुरु विकास पोर्टफोलियो चाहिए था, जो अंततः कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंपा गया।
शांति वार्ता और भविष्य की चुनौतियाँ
शिवकुमार और रेड्डी के बीच देर रात हुई बैठक के बाद संकट कम हुआ। शिवकुमार ने कहा कि सभी समस्याएं सुलझा ली गई हैं और इसे 'पारिवारिक मामला' बताया। हालांकि, नेताओं का दिल्ली आना-जाना यह दर्शाता है कि पोर्टफोलियो को लेकर असंतोष अभी भी बना हुआ है। शिवकुमार के लिए अब चुनौती केवल एक बगावत को सुलझाने से कहीं अधिक है। अधिक अधिकारों की मांग और कैबिनेट में स्थान पाने की इच्छाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिससे कांग्रेस नेतृत्व को फिर से हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
