कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व विवाद: शिवकुमार के समर्थन में विधायकों की बैठक
कांग्रेस सरकार में नेतृत्व परिवर्तन की मांग
कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस सरकार में नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच गया है। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने बेंगलुरु के एक निजी होटल में एकत्र होकर आलाकमान से शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की है।
होटल में हुई बैठक और विधायकों की एकजुटता
मगाडी के विधायक एच.सी. बालकृष्ण द्वारा आयोजित इस बैठक ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार, लगभग 40 समान विचारधारा वाले विधायक इस बैठक में शामिल हुए। इसे आधिकारिक रूप से बालकृष्ण के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित समारोह बताया गया, लेकिन अंदरूनी चर्चा पूरी तरह से नेतृत्व परिवर्तन पर केंद्रित थी।
बालकृष्ण ने कहा कि बृहस्पतिवार रात को लगभग 40 विधायक एकत्र हुए और शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए पैरवी करने का निर्णय लिया। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि उनका जन्मदिन शनिवार को है, इसलिए उन्होंने बृहस्पतिवार को समान विचारधारा वाले लोगों को आमंत्रित किया।
नेतृत्व विवाद पर चर्चा
बैठक के दौरान बालकृष्ण ने कहा कि यदि पार्टी में स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो भविष्य में कठिनाइयाँ आएंगी। उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से इस मुद्दे को सुलझाने का आग्रह करने का निर्णय लिया।
दिल्ली जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि आलाकमान को कर्नाटक में हो रही घटनाओं की जानकारी है। उन्होंने बताया कि जब विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाते हैं, तो उन्हें नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लगातार सवालों का सामना करना पड़ता है।
भविष्य की चिंताएँ
बालकृष्ण ने कहा कि नेताओं को अलग-अलग बुलाने से समाधान नहीं निकलेगा। उन्होंने कहा कि जब विधायक मिलते हैं, तो स्वाभाविक रूप से इस विषय पर चर्चा होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई विधायकों का मानना है कि जब तक यह मुद्दा सुलझेगा नहीं, तब तक स्थिति कठिन रहेगी।
बालकृष्ण ने 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि शीर्ष नेतृत्व चाहे, तो अध्यक्ष पद में बदलाव किया जा सकता है।
सत्ता संघर्ष की पृष्ठभूमि
कर्नाटक में सत्ता संघर्ष नवंबर 2025 से तेज हुआ, जब कांग्रेस सरकार ने अपने ढाई वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। कांग्रेस के सत्ता में आने के समय ऐसी खबरें आई थीं कि सिद्धरमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता-साझाकरण का समझौता हुआ था। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई।
शिवकुमार ने समय-समय पर इस समझौते के संकेत दिए हैं, जबकि सिद्धरमैया का कहना है कि वह पूरे पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करेंगे।
