10 रुपये के विवाद ने एक रेलवे क्लर्क की नौकरी छीन ली: 25 साल बाद मिली न्याय की उम्मीद
10 रुपये की कीमत का बदलता अर्थ
आज के समय में, 10 रुपये का सिक्का मेट्रो शहरों में किसी भिखारी को देने पर भी शायद ही कोई खुशी का इजहार करता है। पहले, 10 रुपये में कई चीजें मिल जाती थीं, लेकिन अब 10 रुपये की बिस्किट के लिए भी पूछना पड़ता है कि उसकी कीमत क्या है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि 10 रुपये की वैल्यू कितनी घट गई है। हालांकि, किसी के लिए यह 10 रुपये की कीमत एक सरकारी नौकरी से 20 साल की बर्खास्तगी और 25 साल की कानूनी लड़ाई के बराबर हो सकती है। एक रेलवे क्लर्क, जिसकी नौकरी इसी 10 रुपये के विवाद में चली गई, 25 साल बाद यह साबित हुआ कि मामला झूठा था।
मामले का विवरण
4 जनवरी 2001 को, नायर श्रीधाम रेलवे स्टेशन पर टिकट बुकिंग का कार्य कर रहे थे। उस दिन भीड़ थी और यात्री टिकट खरीदने के लिए लाइन में लगे थे। उस समय कंप्यूटर का प्रचलन नहीं था, इसलिए टिकट काउंटर पर काफी भीड़ होती थी। 4 जनवरी 2002 को, नायर ड्यूटी पर थे जब अचानक एक विजिलेंस टीम वहां पहुंची। एक छद्म यात्री ने आरोप लगाया कि नायर ने उसे 31 रुपये के बजाय केवल 21 रुपये लौटाए। नायर ने कहा कि भीड़ के कारण गलती हो सकती है, लेकिन उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया गया।
नौकरी का नुकसान
नायर के खिलाफ कार्रवाई की गई और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। विजिलेंस टीम ने यह भी कहा कि उनके पास से 450 रुपये बरामद हुए, जिसे नायर ने अपनी पत्नी की दवाओं के लिए रखा था। इसके बावजूद, उनकी सफाई को अनसुना कर दिया गया। बाद में, अधिकारियों ने दावा किया कि 778 रुपये की कमी थी, लेकिन जांच के दौरान यह राशि घटकर 7 रुपये रह गई। जब मामला 2026 में अदालत में पहुंचा, तो हाई कोर्ट ने पाया कि आरोपों का कोई ठोस सबूत नहीं था।
25 साल की लड़ाई का अंत
कोर्ट ने कहा कि आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था और केवल विजिलेंस टीम के सदस्य की गवाही पर निर्भर किया गया। अदालत ने रेलवे की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यदि कोई छोटी-मोटी गलती हुई भी थी, तो बर्खास्तगी असंगत थी। यह नायर के लिए एक जीत है, लेकिन सवाल यह है कि 25 सालों में जो कुछ खोया है, उसे कैसे वापस लाया जाएगा?
