रुपये की गिरावट: डॉलर के मुकाबले 95.35 पर पहुंचा
रुपये का नया निचला स्तर
30 अप्रैल को डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 95.35 तक गिर गई, जो कि रुपये का अब तक का सबसे कम स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की कमजोरी के पीछे कई कारण हैं, जैसे कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, विदेशी निवेशकों द्वारा बिकवाली और डॉलर की मजबूती। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण डॉलर में मजबूती आई है।
क्रूड की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव
ब्रेंट क्रूड की कीमत 30 अप्रैल को 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो कि 28 फरवरी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले की संभावनाओं के चलते यह वृद्धि हुई है। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि देश अपनी ऑयल जरूरत का 90 प्रतिशत आयात करता है।
रुपये की कमजोरी का आम लोगों पर असर
इस वर्ष रुपये में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। क्वांटम एएमसी की फंड मैनेजर स्नेहा पांडेय ने बताया कि रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हो जाता है, जिससे ईंधन, खाना पकाने का तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतें बढ़ जाती हैं।
निवेशकों पर रुपये की कमजोरी का प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की गिरावट का निवेशकों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आमतौर पर शेयर, डेट और सोने की कीमतें एक समान नहीं होती हैं। खासकर जब करेंसी कमजोर होती है, तो सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है। पांडेय ने सुझाव दिया कि निवेशकों को मल्टीएसेट आवंटन फंड्स में निवेश पर विचार करना चाहिए।
निवेशकों के लिए सलाह
पांडेय ने कहा कि शेयर बाजार में निवेश करने वाले निवेशकों को उन कंपनियों में निवेश करना चाहिए, जिनका राजस्व निर्यात पर निर्भर है। डेट में निवेश करते समय, निवेशकों को कम अवधि वाले या उच्च गुणवत्ता वाले फंड्स पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इससे ब्याज दरों से जुड़े जोखिम को प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
निवेश में अनुशासन बनाए रखना
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को अपने निवेश में अनुशासन बनाए रखना चाहिए। खासकर जो सिप के माध्यम से निवेश कर रहे हैं, उन्हें अपने निवेश को रोकना नहीं चाहिए। शेयर बाजार और करेंसी में उतार-चढ़ाव सामान्य है। कठिन समय में निवेश रोकने वाले निवेशक लंबे समय में बड़ा धन बनाने का अवसर खो देते हैं।
