रायपुर प्रेस क्लब चुनाव: पैनलों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा

रायपुर प्रेस क्लब में चुनावी गतिविधियाँ तेज हो गई हैं, जहाँ विभिन्न पैनल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। सत्ताधारी पैनल के लिए यह चुनाव चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है, जबकि विपक्षी पैनल बिखरे हुए नजर आ रहे हैं। लाल पैनल की एकजुटता और अन्य पैनलों के बीच संभावित गठजोड़ चुनाव को और भी दिलचस्प बना सकते हैं। जानें इस चुनावी मुकाबले की पूरी कहानी और पैनलों की रणनीतियाँ।
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चुनाव की तैयारी में रायपुर प्रेस क्लब

रायपुर। रायपुर प्रेस क्लब में चुनावी गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। लंबे समय से चल रहे सदस्यता विवाद का समाधान अब निकट है। प्रेस क्लब द्वारा 17 फरवरी 2025 तक की सदस्यता सूची को सार्वजनिक न करने के बाद, रजिस्ट्रार कार्यालय से प्राप्त वास्तविक सदस्यता सूची के आधार पर मतदाता सूची का प्रारंभिक प्रकाशन किया गया है। इसके साथ ही, प्रेस क्लब परिसर एक बार फिर चुनावी माहौल में बदल गया है।
पैनल सक्रिय, प्रत्याशियों की तैयारी
चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सभी सक्रिय पैनल अपनी रणनीतियों और प्रत्याशियों के चयन में जुट गए हैं। सत्ताधारी संकल्प–प्रफुल्ल पैनल के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा। संगवारी, सुकांत, दामू और अनिल पैनल जैसे पारंपरिक पैनल पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। चुनावी हलचल के संकेतों से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि कई पैनलों के बीच गठजोड़ की संभावनाएँ बन रही हैं, जिससे मुकाबला और भी दिलचस्प हो सकता है। इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू लाल पैनल की एकजुटता मानी जा रही है।
लाल पैनल के खिलाफ अन्य पैनल एकजुट होते दिख रहे हैं। यह पैनल पिछले कई कार्यकालों से प्रेस क्लब की सत्ता का केंद्र रहा है। हालांकि, इस बार लाल पैनल की स्थिति कमजोर होती नजर आ रही है। इनकम्बेंसी और अन्य पैनलों की सक्रियता ने वैचारिक नेताओं को सतर्क कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, अब तक अलग-अलग पैनलों में अपनी ताकत दिखाने वाले PT, AT और GT ग्रुप को एकजुट करने की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए तीनों लीडर लगातार बैठकें कर रहे हैं।
विपक्षी खेमे में बिखराव की चुनौती
विपक्षी पैनल इस समय बिखरे हुए नजर आ रहे हैं। संगवारी, सुकांत, अनिल और दामू ग्रुप के बीच आपसी सहमति नहीं बन पा रही है, जिससे उनकी रणनीति कमजोर हो रही है। हालांकि, प्रेस क्लब में विरोध का झंडा बुलंद करने वाले कुछ पत्रकार पिछले कार्यकाल की नाकामियों को मुद्दा बनाकर सक्रिय हैं। इस मुद्दा-आधारित लड़ाई का लाभ मोहन तिवारी को मिल सकता है, लेकिन ब्राह्मण बड़े पत्रकारों का एकजुट होना सबसे बड़ी चुनौती है।
वैचारिक एकता बनाम बिखराव
जहाँ एक ओर पदाधिकारियों का वैचारिक पैनल खुद को संगठित करने में सफल हो रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी खेमा फिर से अलग-अलग लड़ने की तैयारी में है, जिससे चुनावी मुकाबला बहुकोणीय होता दिख रहा है।