पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा का महिला आरक्षण पर सवाल उठे

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद भाजपा के महिला आरक्षण पर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी ने 294 सीटों में से केवल 36 महिलाओं को टिकट दिया, जो कि 12-13 प्रतिशत है। क्या भाजपा का 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' केवल एक चुनावी नारा है? जानिए इस मुद्दे पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय और जनता की प्रतिक्रिया।
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भाजपा का नारी शक्ति वंदन अधिनियम: वास्तविकता और आंकड़े

पश्चिम बंगाल/नई दिल्ली: विधानसभा चुनाव 2026 के अंतिम चरण के मतदान के बाद, राजनीतिक गलियारों में चुनावी गणित से ज्यादा नैतिकता और वादों पर चर्चा शुरू हो गई है। भाजपा, जो संसद से 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पारित कराकर ऐतिहासिक श्रेय ले चुकी है, अब जब इसे बंगाल में लागू करने की बारी आई, तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।


33 प्रतिशत का दावा, पर हकीकत में 15 प्रतिशत भी नहीं?


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा महिला आरक्षण की सच्ची समर्थक है, तो बंगाल की 294 सीटों में से कम से कम 97-98 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता यह है कि पार्टी ने केवल 36-40 महिलाओं को टिकट दिया, जो कि 12 से 13 प्रतिशत के आसपास है।


अब जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जिस 'नारी शक्ति' के बल पर चुनाव जीतने का दावा किया जा रहा है, उसे प्रतिनिधित्व देने में इतनी हिचकिचाहट क्यों है?


'हाथी के दांत: खाने के और, दिखाने के और'


विपक्ष और जागरूक नागरिक इसे भाजपा की दोहरी राजनीति मानते हैं। सवाल उठता है:


क्या आरक्षण का कानून केवल 2029 के लिए योजना है?


क्या वर्तमान में स्वेच्छा से महिलाओं को 33 प्रतिशत टिकट देने से किसी ने रोका था?


क्या यह मान लिया जाए कि 'नारी शक्ति वंदन' केवल एक चुनावी नारा है, जिसे लागू करने की मंशा अभी दूर है?


जनगणना और परिसीमन का पेंच, या मंशा का?


सरकार का तर्क है कि तकनीकी कारणों (जनगणना और परिसीमन) के चलते कानून अभी प्रभावी नहीं हो सकता। लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी स्तर पर टिकट वितरण के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि 'इच्छाशक्ति' की जरूरत होती है। बंगाल चुनाव में महिलाओं की भारी भागीदारी के बावजूद उन्हें नेतृत्व की कतार में पीछे रखना, कहीं न कहीं पार्टी के दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।


निष्कर्ष - बंगाल की रणभूमि में ममता बनर्जी की 52 महिला प्रत्याशी हैं, जबकि भाजपा का आंकड़ा 36 है। 4 मई को आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि महिलाएं केवल 'वोट बैंक' बनकर रह जाएंगी या उन्हें वह 33 प्रतिशत का संवैधानिक अधिकार मिलेगा, जिसका ढिंढोरा पीटा जा रहा है। फिलहाल भाजपा का यह रवैया 'हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और' वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है।