छत्रपति संभाजी: एक अद्वितीय योद्धा की गाथा
छत्रपति संभाजी का अद्वितीय जीवन
मराठा इतिहास में छत्रपति संभाजी एक अजेय योद्धा के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें विश्वासघात के कारण बंदी बनाया गया था। औरंगजेब ने उनसे इस्लाम स्वीकार करने और उसकी अधीनता स्वीकार करने का आग्रह किया, लेकिन संभाजी ने इनकार किया। इस इनकार के परिणामस्वरूप उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, जिसमें उनकी जुबान खिंचवाना और आंखें फोड़ना शामिल था। फिर भी, उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका जीवन संघर्षों और त्रासदियों से भरा हुआ था।
शिवाजी की मौत की झूठी खबर
संभाजी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे नौ साल के थे। 1666 में, उनके पिता शिवाजी आगरा में औरंगजेब के दरबार में गए, जहां उन्हें नजरबंद कर दिया गया। शिवाजी ने एक साहसी योजना बनाई और आगरा से भाग निकले, लेकिन संभाजी पीछे रह गए। बाद में, उन्हें मथुरा ले जाया गया। शिवाजी की फरारी के बारे में झूठी खबर फैलाई गई थी कि वे बीमार हैं, जिससे औरंगजेब को भ्रमित किया गया।
संभाजी की वापसी
शिवाजी की योजना सफल रही, लेकिन संभाजी के मन में पिता के छोड़ जाने का दुख बना रहा। औरंगजेब के सैनिकों ने उन्हें खोजने के लिए प्रयास किए, लेकिन संभाजी को सुरक्षित निकालने का कार्य रघुनाथ और त्रिमल भाइयों ने किया। उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया और कठिन रास्तों से आगे बढ़ते रहे। अंततः, संभाजी अपने पिता के पास सुरक्षित पहुंच गए।
जीजा बाई का निधन और संभाजी की उपेक्षा
शिवाजी के राज्याभिषेक के ग्यारहवें दिन जीजा बाई का निधन हो गया। संभाजी की मां पहले ही गुजर चुकी थीं, और अब वे सौतेली माताओं के बीच थे। जीजा बाई के निधन के बाद, सोयला बाई ने संभाजी को पिता से दूर रखने की कोशिश की। इससे संभाजी को और भी उपेक्षित महसूस हुआ।
गद्दी पर बैठते ही संघर्ष
1680 में शिवाजी के निधन के बाद, मराठा दरबार में उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया। संभाजी ने तेजी से स्थिति को संभाला और छत्रपति बने। सत्ता संभालते ही उन्हें मुगलों और अन्य शक्तियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने आक्रामक नीति अपनाई और मुगलों पर लगातार हमले किए।
संभाजी का बलिदान
1689 में, संभाजी को मुगलों ने बंदी बना लिया। उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार किया। अंततः, 11 मार्च 1689 को उनका जीवन समाप्त हो गया। लेकिन उनके बलिदान के बाद मराठों ने और अधिक संघर्ष किया, जो मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बना।
