ईरान ने अमेरिका के साथ वार्ता में भाग लेने से किया इनकार, क्षेत्र में तनाव बढ़ा
मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों को झटका
मध्य पूर्व में शांति की संभावनाओं को एक बड़ा झटका लगा है। ईरान ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा की है कि वह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ होने वाली 'सीज़फ़ायर 2.0' वार्ता में शामिल नहीं होगा। यह निर्णय मौजूदा युद्धविराम की समय सीमा समाप्त होने से ठीक पहले आया है, जिससे क्षेत्र में सैन्य संघर्ष की चिंताएँ फिर से उभर आई हैं।
वार्ता विफल होने के कारण: ईरान का दृष्टिकोण
ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, तेहरान ने इस कूटनीतिक विफलता का पूरा दोष वाशिंगटन पर डाला है। ईरान ने वार्ता से पीछे हटने के लिए कुछ प्रमुख बिंदुओं को उजागर किया है।
अवास्तविक मांगें: ईरान का कहना है कि अमेरिका ऐसी शर्तें रख रहा है जिन्हें पूरा करना असंभव है।
नौसैनिक नाकेबंदी: तेहरान के अनुसार, अमेरिकी नौसेना की निरंतर मौजूदगी ईरानी बंदरगाहों के आसपास सीज़फ़ायर समझौते का उल्लंघन है।
असंगत रुख: ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ़ ने अमेरिकी रवैये को 'भ्रमित' करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ओर शांति की बात करता है, जबकि दूसरी ओर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ा रहा है।
अमेरिका के रवैये पर ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया
एक उच्च-स्तरीय बैठक में, ईरान के उपराष्ट्रपति ने अमेरिका के रवैये की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे असंगत और भ्रमित करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका मिलेजुले संकेत दे रहा है—एक ओर शांति की बात कर रहा है, दूसरी ओर दबाव बढ़ा रहा है, जिससे सार्थक बातचीत में बाधा आ रही है।
ईरान की इस घोषणा से कुछ घंटे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि अमेरिकी अधिकारी बातचीत के लिए इस्लामाबाद जाएंगे, जिससे संभावित सफलता की उम्मीद जगी थी। हालांकि, ईरान के अचानक पीछे हटने से अब पूरी प्रक्रिया पर गंभीर संदेह उत्पन्न हो गया है।
ट्रम्प की चेतावनी से बढ़ा तनाव
ट्रम्प द्वारा दी गई एक कड़ी चेतावनी के बाद स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि यदि कोई समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका ईरान के प्रमुख बुनियादी ढाँचे को निशाना बना सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तेहरान ने 'निष्पक्ष समझौता' को अस्वीकार किया, तो बिजली संयंत्रों और पुलों को नष्ट किया जा सकता है।
पहले के बैक-चैनल प्रयासों के बावजूद, दोनों पक्ष प्रमुख मुद्दों पर अभी भी एक-दूसरे से काफी दूर हैं। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, उसका क्षेत्रीय प्रभाव, और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण शामिल हैं।
इस बीच, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बना हुआ है, और इस महत्वपूर्ण तेल मार्ग के दोनों सिरों पर जहाज़ों के फँसे होने की ख़बरें आ रही हैं। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसमें किसी भी तरह की रुकावट के दूरगामी आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं।
