महाभारत युद्ध: कुरुक्षेत्र की धरती पर आज भी गूंजती हैं चीखें?
महाभारत का युद्ध: एक विनाशकारी घटना
महाभारत का युद्धImage Credit source: AI
कुरुक्षेत्र का इतिहास: महाभारत का युद्ध, जिसे 'धर्मयुद्ध' कहा जाता है, भारतीय इतिहास की सबसे भयानक और विनाशकारी घटनाओं में से एक है। यह युद्ध 18 दिनों तक चला और इसने न केवल राजवंशों को समाप्त किया, बल्कि धरती को भी रक्तरंजित कर दिया। क्या 5000 साल बाद भी उस रणभूमि का दर्द खत्म हो गया है? आज भी कुरुक्षेत्र की मिट्टी के बारे में कई बातें की जाती हैं, जो रोंगटे खड़े कर देती हैं।
18 दिनों का खूनी तांडव और स्त्री पर्व का विलाप
महाभारत के युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेनाएं शामिल थीं। युद्ध के अंत तक केवल कुछ ही लोग जीवित बचे। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो रणभूमि शवों, टूटे रथों और मरे हाथियों से भरी हुई थी। महाभारत के 'स्त्री पर्व' में उस भयानक दृश्य का दिल दहला देने वाला वर्णन मिलता है। गांधारी, कुंती और द्रौपदी जैसी हजारों महिलाएं जब अपने पतियों, पुत्रों और भाइयों के शवों को खोजने आईं, तो उनके विलाप से आसमान गूंज उठा। इतिहासकारों और मान्यताओं के अनुसार, उस समय हवाओं में जो शोक और चीखें थीं, उनका प्रभाव आज भी इस क्षेत्र के वातावरण में महसूस किया जाता है।
क्या आज भी सुनाई देती हैं चीखें?
कुरुक्षेत्र की धरती के बारे में स्थानीय लोगों और पर्यटकों के बीच कई चर्चाएं होती हैं। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र के कुछ हिस्सों की मिट्टी आज भी लाल या गहरी भूरी है, जो लाखों योद्धाओं के बहे रक्त का प्रतीक है। कई यात्री और शोधकर्ता यह दावा करते हैं कि जहां गीता का ज्ञान दिया गया, वहां शाम होते ही एक अजीब सा सन्नाटा और भारीपन महसूस होता है।
क्या आज भी भटकती हैं आत्माएं?
कुरुक्षेत्र के आसपास कई लोककथाएं प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जिन योद्धाओं की मृत्यु छल से हुई या जिन्हें उचित अंतिम संस्कार नहीं मिला, उनकी आत्माएं आज भी इस क्षेत्र में मुक्ति की तलाश में भटक रही हैं। लोग यहां अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान करने आते हैं।
ब्रह्म सरोवर और शांति की खोज
युद्ध के बाद की अशांति और नकारात्मकता को दूर करने के लिए कुरुक्षेत्र के विभिन्न सरोवरों का महत्व बढ़ गया। माना जाता है कि युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने मृतकों की आत्मा की शांति के लिए यहां तर्पण और अनुष्ठान किए थे। आज लाखों लोग ब्रह्म सरोवर और सन्नहित सरोवर में स्नान करने आते हैं ताकि उस ऐतिहासिक भारीपन से मुक्ति मिल सके।
अनुभवों की सच्चाई
हालांकि वैज्ञानिक रूप से आत्माओं या चीखों की बात साबित नहीं हुई है, लेकिन पैरानॉर्मल गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोग इसे रेसिड्यूअल एनर्जी मानते हैं। उनका मानना है कि इतनी बड़ी त्रासदी की यादें उस स्थान की ऊर्जा में कैद हो जाती हैं।
