जयपुर के गांवों में पानी की गंभीर समस्या: फ्लोराइड और लवणता का संकट

जयपुर जिले के चौमूं उपखंड के गांवों में पानी की गुणवत्ता में गिरावट आई है, जिससे फ्लोराइड और लवणता की समस्या बढ़ गई है। यह स्थिति न केवल पेयजल संकट का कारण बन रही है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लोराइड युक्त पानी से हड्डियों की कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। जानिए इस संकट के पीछे के कारण और इसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
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जयपुर के गांवों में पानी की गंभीर समस्या: फ्लोराइड और लवणता का संकट

पानी की गुणवत्ता में गिरावट

जयपुर के गांवों में पानी की गंभीर समस्या: फ्लोराइड और लवणता का संकट

जयपुर जिले के चौमूं उपखंड के 50 से अधिक गांव, जो पहले मीठे पानी के लिए जाने जाते थे, अब खारे पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। गिरते भूजल स्तर और बढ़ते फ्लोराइड के कारण न केवल पेयजल संकट बढ़ा है, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। कई गांवों में पानी अब बीमारियों का कारण बनता जा रहा है, जिससे जोड़ों का दर्द, हड्डियों की कमजोरी और दांतों की समस्याएं बढ़ रही हैं। उपखंड क्षेत्र में भूजल स्तर 900 से 1200 फीट तक पहुंच गया है और फ्लोराइड का स्तर 1500 से 2500 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है।

पीने के लिए अनुपयुक्त पानी, आरओ भी बेअसर…
गोविंदगढ़, मलिकपुर, सीतारामपुरा, चारणवास, किशन मानपुरा, आष्टी, हस्तेड़ा, बागड़ों का बास, आलिसर, सांदरसर, सिंगोद, कालाडेरा, जालिम सिंह का बास, खन्नीपुरा, खेजरोली, लोहरवाड़ा और उदयपुरिया जैसे गांवों में पानी में फ्लोराइड और लवणता इतनी बढ़ गई है कि यह पीने के लिए अनुपयुक्त हो गया है। लोगों ने घरों में आरओ प्लांट लगाकर समाधान खोजने की कोशिश की, लेकिन अधिक लवणता के कारण यह तकनीक भी सीमित साबित हो रही है। इससे गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए शुद्ध पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन गई है।

ढाणियों में कुओं पर निर्भरता…
गांवों और कस्बों में जहां सार्वजनिक जलापूर्ति से कुछ राहत मिलती है, वहीं ढाणियों में लोग अब भी पेयजल के लिए कृषि कुओं और बोरिंग पर निर्भर हैं। अधिकांश स्थानों पर पानी की नियमित जांच नहीं होने के कारण लोग अनजाने में दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सुरक्षित पेयजल में टीडीएस 300 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिए, जबकि 300 से 600 मिलीग्राम तक का स्तर स्वीकार्य माना जाता है। इसके विपरीत, क्षेत्र में कई जगहों पर टीडीएस 1500 से 2500 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है, जिससे पानी का स्वाद खारा और कसैला हो गया है।

स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव…
चिकित्सकों के अनुसार, फ्लोराइड युक्त पानी शरीर में धीरे-धीरे जमा होकर हड्डियों को कमजोर करता है और अस्थि फ्लोरोसिस जैसी बीमारियों को जन्म देता है। बच्चों में यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि उनकी हड्डियां विकासशील अवस्था में होती हैं। गर्भवती महिलाएं यदि लंबे समय तक ऐसा पानी पीती हैं, तो इसका असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ सकता है। क्षेत्र में अब कम उम्र में ही लोगों में कमर झुकना, शारीरिक कमजोरी, हाथ-पैरों में विकृति, दांतों का पीला पड़ना और मसूड़ों की समस्याएं बढ़ने लगी हैं। इसके साथ ही पथरी के मामलों में भी वृद्धि हो रही है।

अस्पतालों में मरीजों की संख्या में वृद्धि…
गोविंदगढ़ सीएचसी के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 5 वर्ष पहले फ्लोराइड से संबंधित बीमारियों के मरीजों की संख्या करीब 5 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 10 से 15 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यही स्थिति चौमूं उपजिला अस्पताल और अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी देखी जा रही है।

विशेषज्ञों की राय…
अधिक फ्लोराइड युक्त पानी का सेवन गर्दन, पीठ, कंधे और घुटनों के जोड़ों व हड्डियों पर असर डालता है। इसके अलावा, स्मरण शक्ति में कमी, गुर्दे की बीमारी और बांझपन जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
-डॉ. दशरथ मीणा, सीएचसी प्रभारी, गोविंदगढ़