ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति और चीन की चुप्पी पर सवाल

ईरान ने मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया है, जो अयातुल्ला खामेनेई के बेटे हैं। उनकी नियुक्ति के पीछे ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का दबाव है। इस बीच, चीन ने ईरान का समर्थन करने का आश्वासन दिया है, लेकिन अमेरिका और इजराइल के हमलों पर चुप्पी साधी हुई है। जानें इस चुप्पी के पीछे की वजहें और मोजतबा खामेनेई की राजनीतिक भूमिका के बारे में।
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ईरान में नए सुप्रीम कमांडर की नियुक्ति

ईरान ने अपने नए सुप्रीम कमांडर की घोषणा कर दी है। अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद, अब मोजतबा खामेनेई को इस पद पर नियुक्त किया गया है। ईरान की विशेषज्ञ सभा ने उन्हें देश का नया सर्वोच्च नेता चुना है। रिपोर्ट के अनुसार, यह निर्णय ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर के दबाव में लिया गया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कट्टरपंथी गुटों को एकजुट कर मोजतबा के पक्ष में समर्थन जुटाया है, क्योंकि वे उनके पिता के करीबी सहयोगी रहे हैं और सुरक्षा तंत्र में उनकी मजबूत पकड़ है।


मोजतबा खामेनेई का परिचय

कौन हैं मोजतबा खामेनेई


मोजतबा खामेनेई का जन्म 1969 में मशहद में हुआ था। उन्होंने प्रभावशाली शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया। वे ईरान के प्रमुख इस्लामी मदरसे क़ोम सेमिनरी में धर्मशास्त्र पढ़ाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में उनका राजनीतिक महत्व बढ़ा है और उन्होंने शासन में महत्वपूर्ण निर्णय लेने में भाग लिया है। मोजतबा ने 2005 और 2009 के चुनावों में महमूद अहमदीनेजाद का समर्थन किया और 2009 में राष्ट्रपति की जीत में उनकी भूमिका बताई जाती है। हालांकि, बाद में दोनों के बीच संबंधों में खटास आ गई। 2021 में उन्हें अयातुल्ला की उपाधि दी गई, जो सर्वोच्च नेता बनने के लिए आवश्यक है।


चीन की चुप्पी पर सवाल

अमेरिका के खिलाफ चीन की चुप्पी


चीन के विदेश मंत्री वांग ने ईरान के विदेश मंत्री से फोन पर बात की और तेहरान का समर्थन करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि चीन ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करेगा। लेकिन सवाल यह है कि चीन अमेरिका और इजराइल के हमलों पर चुप क्यों है? क्या चीन नहीं चाहता कि ईरान परमाणु शक्ति बने? चीन ने ईरान में 400 बिलियन डॉलर का निवेश किया है, फिर भी वह चुप्पी साधे हुए है। इसका कारण यह हो सकता है कि ईरान ने मध्य पूर्व में आक्रामकता बढ़ा दी है, जिससे चीन अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को प्रभावित नहीं करना चाहता।