फिल्म 'एक दिन': एक कमजोर कहानी का अनुभव

फिल्म *एक दिन* जुनैद खान और साई पल्लवी के साथ एक रोमांटिक कहानी पेश करती है, लेकिन इसकी कमजोर पटकथा और दोनों के बीच की कमी इसे प्रभावित करती है। निर्देशक सुनिल पांडे ने जापान के खूबसूरत दृश्यों का उपयोग किया है, लेकिन कहानी की गहराई की कमी इसे एक साधारण अनुभव बनाती है। क्या यह फिल्म देखने लायक है? जानने के लिए पढ़ें पूरी समीक्षा।
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फिल्म 'एक दिन': एक कमजोर कहानी का अनुभव gyanhigyan

फिल्म का परिचय


फिल्म *एक दिन* आमिर खान के बेटे जुनैद खान की पहली फिल्म है, जिसमें वह प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेत्री साई पल्लवी के साथ नजर आते हैं। हालांकि, कमजोर पटकथा के कारण यह फिल्म अपनी पूरी क्षमता को नहीं छू पाती।


कहानी

कहानी नोएडा की एक व्यस्त आईटी कंपनी से शुरू होती है, जहां एक युवा व्यक्ति, दिनेश, काम करता है। जुनैद खान द्वारा निभाए गए दिनेश एक साधारण और अंतर्मुखी व्यक्ति हैं। वह अपने काम में इतना डूबा हुआ है कि ऑफिस में भीड़ के बीच वह पूरी तरह से अदृश्य महसूस करता है। उसी ऑफिस में साई पल्लवी द्वारा निभाई गई मीरा नाम की एक युवा महिला भी है। दिनेश मीरा से गहराई से प्यार करता है, लेकिन वह उसकी भावनाओं से अनजान है। कहानी में नया मोड़ तब आता है जब पूरी टीम एक आधिकारिक यात्रा पर जापान भेजी जाती है। जापान का चयन इसलिए किया गया क्योंकि मीरा को वहां की संस्कृति और बर्फ से ढकी पहाड़ियों से गहरा लगाव है। जापान पहुंचने पर मीरा एक मानसिक और भावनात्मक संकट का सामना करती है, जिसमें उसे एक दुर्लभ स्थिति, ट्रांजिएंट ग्लोबल अम्नेशिया (TGA) का पता चलता है। इस स्थिति में व्यक्ति की याददाश्त एक निश्चित समय के लिए धुंधली हो जाती है। एक दुर्घटना के बाद मीरा इस स्थिति में चली जाती है, लेकिन उसे उम्मीद है कि वह अगले दिन अपनी याददाश्त वापस पा लेगी। फिल्म पूरी तरह से इसी एक दिन की कहानी पर आधारित है।


अभिनय

साई पल्लवी इस फिल्म के साथ हिंदी सिनेमा में कदम रख रही हैं और उन्होंने अपने किरदार में पूरी ईमानदारी दिखाई है। उनके भावनात्मक दृश्यों में मासूमियत और आंखों में गहराई फिल्म के बेहतरीन तत्वों में से एक है। हालांकि, पटकथा ने उन्हें एक कमजोर चरित्र के रूप में सीमित कर दिया है। जुनैद खान इस फिल्म में अपने पिछले कामों की तुलना में अधिक संयमित नजर आते हैं। उन्होंने दिनेश की सरलता को अच्छी तरह से दर्शाया है, लेकिन उनकी स्क्रीन उपस्थिति और करिश्मा की कमी साफ नजर आती है। फिल्म में कुणाल कपूर का एक संक्षिप्त कैमियो भी है, जो प्रभावशाली है, लेकिन उन्हें प्रदर्शन का बहुत सीमित अवसर मिला है।


निर्देशन

सुनिल पांडे का निर्देशन तकनीकी रूप से सटीक है, लेकिन यह एक प्रेम कहानी के लिए आवश्यक भावनात्मक गहराई से वंचित है। निर्देशक ने जापानी स्थलों का बेहतरीन उपयोग किया है, लेकिन पात्रों के बीच भावनात्मक गतिशीलता को प्रभावी ढंग से नहीं दर्शा पाए। उन्होंने एक जादुई प्रेम कहानी बनाने की कोशिश की, लेकिन उनका निर्देशन 90 के दशक की फ़िल्मों की याद दिलाता है। आज के दर्शकों की अपेक्षाएं अधिक तार्किक और समझदारी भरी कहानियों की हैं।


छायांकन

फिल्म का छायांकन सबसे मजबूत और आकर्षक पहलू है। होक्काइडो की खूबसूरत घाटियाँ, बर्फ से ढके रास्ते और हल्की सर्दी की रोशनी को अद्भुत तरीके से कैद किया गया है। हर फ्रेम एक पोस्टकार्ड की तरह दिखता है। फिल्म देखने पर ऐसा लगता है जैसे आप किसी यात्रा एजेंसी के विज्ञापन को देख रहे हैं।


संगीत

फिल्म का संगीत औसत है। मुख्य गीत, जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है, सुनने में सुखद है, लेकिन यह लंबे समय तक याद नहीं रहता। आज के समय में, जब संगीत किसी प्रेम कहानी की आत्मा होता है, यह फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और गाने कहानी को समर्थन देने में असफल रहते हैं।


कमजोरियाँ

फिल्म की सबसे बड़ी कमी जुनैद खान और साई पल्लवी के बीच की पूरी कमी है। एक रोमांटिक फिल्म तभी सफल होती है जब दर्शक ऑन-स्क्रीन जोड़ी के बीच प्यार महसूस कर सकें। इसके अलावा, कहानी की बासीपन और कमजोर लेखन फिल्म को नीचे खींचते हैं।


अंतिम निर्णय

अगर फिल्म *एक दिन* को एक वाक्य में वर्णित किया जाए, तो यह एक कमजोर कहानी है जो बेहतरीन पैकेजिंग में लिपटी हुई है। निर्देशक सुनिल पांडे ने जापान के बर्फीले दृश्यों का उपयोग करके फिल्म को दृश्यात्मक रूप से आकर्षक बनाने की कोशिश की है, लेकिन इसकी आत्मा—"लेखन"—इतनी कमजोर है कि ये भव्य स्थान भी इसे बचा नहीं सकते। यदि आप बस समय बिताने के लिए देख रहे हैं, तो इसे देख सकते हैं। मेरी रेटिंग इस फिल्म के लिए 2 में से 5 सितारे हैं।


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