प्रदीप सरकार की 'परिणीता' का नया रूप: एक रोमांटिक ड्रामा

कहानी का नया दृष्टिकोण
यह एक दिलचस्प और संवेदनशील प्रस्तुति है, जो बांग्ला साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के पुरुष अहंकार और प्रेम के मामलों पर इसके दुखद प्रभावों का अध्ययन करती है। प्रदीप सरकार की यह नई व्याख्या मूल सामग्री से काफी भिन्न है।
सारकार का दृष्टिकोण शरतचंद्र की कृति को एक नई रोशनी में प्रस्तुत करता है। जबकि भंसाली की फिल्म भावनात्मक और दृश्यात्मक रूप से भव्य थी, सरकार की प्रस्तुति अधिक संयमित और कभी-कभी संकोच में है। फिर भी, यह अचानक से बाहरी सौंदर्य की ओर भी मुड़ जाती है।
कहानी में पिता और पुत्र के बीच की संवादों की तीव्रता दर्शकों को भंसाली की 'देवदास' की याद दिलाती है। दोनों पिता अपने बिगड़ैल बेटों की प्रेमिकाओं को अपमानित करते हैं।
सरकार ने कहानी में एक तीव्रता भरी है, जहां नायक अपने अहंकार के कारण प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाता। लेकिन अंततः, शेखर अपने विवेक और दिल के सामने खड़ा होता है।
इस फिल्म में शेखर का चरित्र कमजोर नहीं है, और न ही यह फिल्म।
किरदारों की गहराई
शेखर और लोलिता के बीच के दृश्य स्वाभाविकता की एक गुणवत्ता रखते हैं। शरतचंद्र की कृतियों में बचपन का प्यार हमेशा मौजूद रहता है। सरकार की 'परिणीता' में एक नया मोड़ है: एक दुखद लेकिन उत्साही रोमांटिक मोड़।
सैफ अली खान और नवोदित विद्या बालन की जोड़ी एक-दूसरे के लिए पूरी तरह से उपयुक्त लगती है। संजय दत्त, जो लोलिता के बड़े सहायक की भूमिका में हैं, अब परिपक्व और आत्म-निंदा करने वाले दिखते हैं।
सरकार ने 1960 के दशक के कोलकाता के धनी वर्ग की सामाजिक जीवन को पुनर्निर्मित किया है। फिल्म हमें उस युग में ले जाती है जब अस्तित्व का संकट दो खूबसूरत महिलाओं के बीच चयन करने का होता था।
निष्कर्ष
सरकार की 'परिणीता' एक रोमांटिक ड्रामा और एक युगीन फिल्म के रूप में सफल होती है। इसमें पात्रों और उनके सामाजिक परिवेश के प्रति एक गहरी समझ है।
हालांकि फिल्म में भंसाली की 'देवदास' की समानताएं हैं, लेकिन प्रदीप सरकार की 'परिणीता' एक अलग अनुभव प्रदान करती है।