धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म 'इक्कीस': एक अनकही कहानी
धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म 'इक्कीस' का रिव्यू
श्रीराम राघवन की 'इक्कीस' में छिपे हैं कई अनकहे जज्बात.Image Credit source: सोशल मीडिया
इक्कीस का रिव्यू: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म 'इक्कीस' अब सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो चुकी है। जब हम किसी युद्ध फिल्म या युद्ध पर आधारित जीवनी को देखने जाते हैं, तो हमें आमतौर पर धमाकों, सरहद पर चीख-पुकार और दुश्मन देशों के खिलाफ तेज संवाद देखने को मिलते हैं। हम जानते हैं कि अंत में नायक शहीद होगा, फिर भी हम दिल पर पत्थर रखकर थिएटर में जाते हैं ताकि उन गुमनाम नायकों की कहानी जान सकें जिन्होंने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। 'इक्कीस' भी इसी कारण देखी गई।
इस फिल्म को लेकर मन में एक जिज्ञासा थी कि आज के समय में जब 'बॉर्डर 2' जैसी मेगा फिल्में बन रही हैं, श्रीराम राघवन जैसे निर्देशक इस ट्रेंड में खुद को कैसे ढालेंगे? क्या वे दर्शकों की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे? फिल्म देखने के बाद ये सवाल सही साबित हुए, क्योंकि 'इक्कीस' एक साधारण युद्ध फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक विशेष फिल्म है। धर्मेंद्र की यह अंतिम फिल्म आपको उस स्थान पर चोट करती है जहां आप उम्मीद नहीं करते, सीधे आपके दिल पर।

श्रीराम राघवन ने इस कहानी को उसी गहराई और बारीकी से बुना है, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है। यह 'दिल से बनाया गया सिनेमा' है, जो उनके दिल से सीधे हमारे दिल तक पहुंचता है। अब धर्मेंद्र और अगस्त्य नंदा की यह फिल्म बाकी फिल्मों से अलग क्यों है और क्यों आपको इसे नहीं छोड़ना चाहिए? इसके लिए आपको पूरा रिव्यू पढ़ना होगा।
कहानी का सारांश
2001 की एक सुबह, पाकिस्तान के ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार के घर में एक विशेष तैयारी चल रही है। एक भारतीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर का स्वागत होना है, जिनका नाम मदनलाल खेत्रपाल है, जो अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) के पिता हैं। महज 21 साल की उम्र में अरुण खेत्रपाल ने 1971 की जंग में देश के लिए जान न्योछावर कर दी थी। विभाजन के समय जो परिवार सरगोधा (अब पाकिस्तान) से भारत आया था, वह पिता उस मुल्क में क्यों जाना चाहता है, जिसने पहले उनसे उनका घर और बाद में उनका बेटा छीन लिया? इन सवालों के जवाब और अरुण खेत्रपाल की बहादुरी और उनके पिता के इस भावुक सफर को जानने के लिए आपको थिएटर जाकर 'इक्कीस' देखनी होगी।

फिल्म की विशेषताएँ
एक अंग्रेजी कहावत है “जो लोग युद्ध चाहते हैं, वे कभी लड़ते नहीं; और जो लड़ते हैं, वे कभी युद्ध नहीं चाहते।” इसका मतलब है, जो युद्ध चाहते हैं वे कभी लड़ते नहीं, और जो लड़ते हैं वे कभी युद्ध नहीं चाहते। एसी कमरे में बैठकर सोशल मीडिया पर दुश्मन देश से लड़ने की बातें करना आसान होता है, लेकिन इस लड़ाई में शहीद हुए जवानों के परिवारों का क्या हाल होता है? यह वो लोग नहीं समझ पाते। तिरंगे में लिपटे हुए घर आने वाले बेटे की शहादत उसके परिवार वालों के लिए क्या मायने रखती है? इसका जवाब श्रीराम राघवन ने अपनी फिल्म 'इक्कीस' में दिया है।
श्रीराम राघवन ने 'इक्कीस' को 'धुरंधर' जैसी फिल्मों के शोर से दूर रखा है। इसमें लाउड म्यूजिक की जगह भावनाओं का ठहराव देखने को मिलता है। फिल्म में न किसी की गर्दन उड़ती है, न शरीर छलनी होते हैं, फिर भी शहीद के बलिदान की चुभन, उसके परिवार का दर्द हमारी आंखों को नम कर देता है। दरअसल, यह श्रीराम राघवन और मैडॉक फिल्म के विजन की जीत है कि उन्होंने आज के सो कॉल्ड 'एक्शन और वायलेंस ट्रेंड' के सामने अपने घुटने नहीं टेके।

लेखन और निर्देशन
इक्कीस का निर्देशन करने के साथ-साथ श्रीराम राघवन ने अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती के साथ मिलकर इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है। 'बदलापुर' और 'अंधाधुन' जैसे मास्टरपीस देने वाले श्रीराम का अपना एक सिग्नेचर स्टाइल है। उनकी हर फिल्म एक नई दुनिया की सैर कराती है, यह उनकी पहली युद्ध जीवनी है और यकीन मानिए, अगर पिछले साल रिलीज हुई उनकी 'मैरी क्रिसमस' से आपकी जो भी शिकायतें थीं, वे इस फिल्म को देखने के बाद आप भूल जाएंगे।
इस फिल्म में श्रीराम ने एक जोखिम भरा रास्ता चुना है। इक्कीस हमारे सामने अलग-अलग उम्र के लोगों का भारत-पाकिस्तान के आपसी रिश्ते को देखने का दिलचस्प नजरिया पेश करती है। उदाहरण के तौर पर, एक तरफ जहां 21 साल का, जोश और जुनून से भरा अरुण खेत्रपाल पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहता है, वहीं बेटे की शहादत के 30 साल बाद उसी मुल्क की धरती पर खड़े उनके पिता के दिल में कोई कड़वाहट नहीं है। यह एक गहरी सोच है जिसे अक्सर हम खोखले राष्ट्रवाद के शोर में भूल जाते हैं।

हालांकि यह फिल्म सिर्फ इमोशंस पर नहीं टिकी है। तकनीकी रूप से भी यह शानदार है। अब तक हमने फिल्मों में जमीन, हवा और समंदर में होने वाली लड़ाइयां देखी हैं। लेकिन यहां लड़ाई है आर्मी टैंक की बटालियन में, जिसे अक्सर 'हॉर्स' के नाम से जाना जाता है। फिल्म में श्रीराम हमें 'पूना हॉर्स' के जाबांजों से मिलवाते हैं, जो वॉर टैंक चलाते हैं। अरुण खेत्रपाल एक टैंक कमांडर थे और बॉलीवुड के इतिहास में यह पहली बार है, जब टैंकों की लड़ाई को इतना जीवंत और रोमांचक दिखाया गया है। श्रीराम हमें युद्ध के मैदान और उस तनावपूर्ण माहौल में इस कदर डुबो देते हैं कि समय का पता ही नहीं चलता।
अभिनय
धर्मेंद्र इस फिल्म की आत्मा हैं। 'रॉकी और रानी की प्रेम कहानी' में जहां वह थोड़े थके हुए नजर आए थे, वहीं 'इक्कीस' में उनकी ऊर्जा और सहजता हैरान कर देने वाली है। स्क्रीन पर उन्हें देखकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि वह अब हमारे बीच नहीं हैं। फ्लैशबैक हो या वर्तमान, हर सीन में उनके हाव-भाव और संवाद डिलीवरी उतनी ही प्रभावशाली है।
अगस्त्य नंदा की बात करें तो वह 'डायरेक्टर्स एक्टर' हैं। लेकिन कई सीन में उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो AI की मदद से युवा अभिषेक बच्चन को पर्दे पर उतार दिया गया हो। एक अनुशासित और 'पॉलिश्ड' आर्मी किड के तौर पर अगस्त्य ने बेहतरीन काम किया है। एक प्रिविलेज्ड बैकग्राउंड से आने वाले उस जिद्दी और जुनूनी नौजवान के इस किरदार को उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया है। जयदीप अहलावत हमेशा की तरह शानदार हैं। असरानी चंद मिनटों के लिए स्क्रीन पर आते हैं और हमारे चेहरे पर मुस्कान छोड़कर चले जाते हैं। जसकिरण के रूप में सिमर भाटिया का काम भी अच्छा है।
क्या देखें या नहीं?
अगर आप एक ऐसी युद्ध जीवनी फिल्म की तलाश में हैं, जहां सिर्फ जोर-जोर से संवाद बोले जा रहे हों और हीरो दुश्मन के छक्के छुड़ा रहा हो, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। अगर आपको सिर्फ 'वॉयलेंस', मार-धाड़ और खून-खराबा वाला एक्शन चाहिए, तो यहां आपका 'रॉन्ग नंबर' लग सकता है। लेकिन, अगर आप एक अच्छा और सच्चा सिनेमा देखना चाहते हैं, तो आपको यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

यह फिल्म देखते हुए मुझे मिता संतरा की याद आ गई। मिता के पति बबलू संतरा, पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए उन 40 जवानों में से एक थे। हमले के बाद जब मिता ने यह स्टैंड लिया कि “युद्ध हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता”, तो सोशल मीडिया के 'कीबोर्ड वॉरियर्स' ने उन्हें बुरी तरह ट्रोल किया और एक शहीद की विधवा को 'देशद्रोही' तक कह दिया।
उस वक्त कई लोगों के मन में सवाल उठा होगा कि आखिर एक शहीद की पत्नी ऐसा क्यों सोच रही है? इसका जवाब आपको 'इक्कीस' में मिलेगा। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर पिता और एक पूर्व फौजी की बेटी रही मां, दो देश के बीच हुई इस जंग को और सरहद के उस पार अपने बच्चे पर बंदूक ताने खड़े दुश्मन फौजी को किस नजरिए से देखते हैं? इसका जवाब यह फिल्म आपको देती है।
‘बंदा’ के बाद अगर कोई दिल से फिल्म बनी है, तो वह 'इक्कीस' है। अगर हम अच्छे सिनेमा की कद्र नहीं करेंगे, तो हमें घटिया कंटेंट की शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है। यह फिल्म केवल एक फौजी की नहीं, बल्कि उस गरिमा की कहानी है जो एक सैनिक और उसका परिवार ताउम्र ओढ़े रहता है। यह एक ऐसा अहसास है जिसे सब को महसूस करना जरूरी है। क्या आप भी इस महान शहीद की अनकही गाथा का हिस्सा बनना चाहेंगे? अपने नजदीकी सिनेमाघरों में इस वीकेंड 'इक्कीस' जरूर देखें。
