ओम पुरी की संघर्ष भरी कहानी: बचपन से लेकर सिनेमा तक का सफर

ओम पुरी की कहानी एक प्रेरणादायक यात्रा है, जिसमें उन्होंने बचपन की कठिनाइयों का सामना करते हुए सिनेमा की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनके संघर्ष और सफलता की यह दास्तान हमें यह सिखाती है कि कठिनाइयों के बावजूद अपने सपनों को साकार किया जा सकता है। जानें कैसे ओम पुरी ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे और अंततः एक सफल अभिनेता बने।
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ओम पुरी की संघर्ष भरी कहानी: बचपन से लेकर सिनेमा तक का सफर

ओम पुरी: एक अद्वितीय कलाकार की यात्रा

ओम पुरी की संघर्ष भरी कहानी: बचपन से लेकर सिनेमा तक का सफर

कला फिल्मों के नायक ओम पुरी

सिनेमा की दुनिया अपनी चमक-दमक के लिए जानी जाती है, लेकिन इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए कई कलाकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। कई प्रसिद्ध सितारों की कहानियों में यह बात स्पष्ट होती है। कुछ ने मुंबई के रेलवे प्लेटफॉर्म पर रात बिताई, तो कुछ ने सड़क किनारे अखबार बिछाकर गुजारा किया। ऐसे ही एक अद्भुत कलाकार की कहानी है, जो किसी भी मानक पर फिल्म इंडस्ट्री के लिए उपयुक्त नहीं थे। चेहरे पर चेचक के निशान और बेहद दुबले-पतले, ये हैं ओम पुरी।

ओम पुरी ने एनएसडी से निकलने के बाद फिल्मों में कदम रखा। श्याम बेनेगल की फिल्मों जैसे 'मंडी' और 'आक्रोश' के बाद उन्हें गोविंद निहलानी की 'अर्ध्य सत्य' से पहचान मिली। एनएसडी तक पहुंचना ही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी। ओम पुरी की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनके संघर्ष की कहानी अपने आप में एक प्रेरणादायक बायोपिक है।

भूखे रहने की मजबूरी

आज हम ओम पुरी के उस बचपन की कहानी साझा कर रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। एक सफल कलाकार अपने बचपन में दाने-दाने के लिए मोहताज रहा। ओम पुरी ने अपने संघर्ष की दास्तान वरिष्ठ पत्रकार शिवेंद्र सिंह को सुनाई थी, जो बेहद भावुक करने वाली है।

ओम पुरी का जन्म अंबाला में हुआ। उनके पिता भटिंडा रेलवे के स्टोर में काम करते थे, और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पिता की नौकरी से मिलने वाली राशि से चार लोगों का गुजारा मुश्किल था। ओम पुरी ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया कि कभी-कभी वह रेलवे के इंजन में बैठकर सफर करते थे, लेकिन असली संघर्ष तो अभी बाकी था।

पिता की नौकरी चली गई

जब उनके पिता की नौकरी चली गई और उन्हें जेल भेज दिया गया, तो परिवार बेघर हो गया। ओम पुरी उस समय केवल 6 साल के थे। परिवार की स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें फुटपाथ पर रहना पड़ा। बड़े भाई को रेलवे स्टेशन पर कुली बनना पड़ा और ओम पुरी को चाय की दुकान पर काम करने के लिए भेजा गया।

चाय की दुकान पर काम

ओम पुरी ने चाय की दुकान पर जूठी ग्लासें धोने का काम किया। वह ग्राहकों को चाय देते थे और इस काम में उन्हें मजा आने लगा। उनके पिता अब भी जेल में थे, लेकिन उनकी मां ने जज से मदद मांगी और अंततः पिता को बरी कर दिया गया।

ओम पुरी की संघर्ष भरी कहानी: बचपन से लेकर सिनेमा तक का सफर

मामा का सहारा

पिता की नौकरी जाने के बाद ओम पुरी के मामा ने उन्हें अपने घर में रखा। हालांकि, मामा और पिता के बीच विवाद के कारण ओम पुरी को घर से निकाल दिया गया। उन्होंने स्कूल में पढ़ाई जारी रखी और ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुजारा किया।

रंगमंच की ओर कदम

कॉलेज में नाटक करने के दौरान ओम पुरी ने रंगमंच के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी। एनएसडी में दाखिला लेने के बाद उन्हें स्कॉलरशिप मिली और उन्होंने वहां तीन साल बिताए। अंततः, श्याम बेनेगल ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में मौका दिया।

ओम पुरी की कहानी संघर्ष और सफलता की एक अद्भुत मिसाल है, जो हमें यह सिखाती है कि कठिनाइयों का सामना करके भी हम अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।