केरल चुनाव में बगावत: सीपीआईएम के नेता जी सुधाकरण ने कांग्रेस का हाथ थामा
मुख्यमंत्री की बढ़ती चिंता
केरल में चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की चिंता बढ़ती जा रही है। उनकी परेशानी का मुख्य कारण उनकी पार्टी के बागी नेता हैं, जो अब खुलकर बगावत कर रहे हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) के वरिष्ठ नेता जी सुधाकरण ने अब कांग्रेस के साथ मंच साझा किया है, जो लेफ्ट के गढ़ में एक नई स्थिति उत्पन्न कर रहा है। यह पहली बार है जब पार्टी के भीतर इस तरह की टूट देखने को मिल रही है।
सुधाकरण अकेले नहीं हैं; लगभग एक दर्जन अन्य नेता भी सीएम विजयन के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
सुधाकरण की पार्टी से विदाई
सी सुधाकरण को 2021 के चुनाव में पार्टी से हटा दिया गया था, लेकिन उन्होंने पार्टी की विचारधारा का समर्थन जारी रखा। पिछले पांच वर्षों में राज्य की राजनीति में कई बदलाव आए हैं, जिससे पार्टी के भीतर विद्रोह की भावना बढ़ गई है। अब, सुधाकरण ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है, और कांग्रेस ने उन्हें समर्थन देने का निर्णय लिया है।
इस स्थिति में, लेफ्ट के लिए अलप्पुझा सीट पर चुनाव लड़ना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
बागियों की बढ़ती संख्या
जी सुधाकरण ने 63 वर्षों तक कम्युनिस्ट पार्टी को समर्पित किया है। उनका राजनीतिक इतिहास लंबा है, और आमतौर पर केरल में लेफ्ट के नेता अपनी पार्टी के खिलाफ नहीं बोलते। लेकिन इस बार, केवल सुधाकरण ही नहीं, बल्कि अन्य नेता भी पार्टी की समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। सीएम विजयन ने कहा कि कुछ नेताओं में संसदीय महत्वाकांक्षा बढ़ गई है, जिससे चुनाव जीतने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पहले इस तरह की बगावतें नहीं होती थीं।
अन्य बागी नेता
सुधाकरण के अलावा, वी कुन्हीकृष्णन और टी के गोविंदन जैसे प्रमुख नेता भी बगावत कर चुके हैं। वी कुन्हीकृष्ण पय्यानूर से और गोविंदन तालिपारम्बा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। गोविंदन ने पार्टी पर टिकट न देने का आरोप लगाया है। हालांकि, सीएम विजयन का कहना है कि टिकट वितरण में एक सुनियोजित प्रक्रिया का पालन किया जाता है।
गौरतलब है कि गोविंदन और कुन्हीकृष्ण को भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन प्राप्त है।
9 अप्रैल को मतदान
केरल में लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रहे लेफ्ट गठबंधन के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस कोई गलती नहीं करती है, तो यूडीएफ की जीत सुनिश्चित है। हालांकि, बागियों ने कांग्रेस गठबंधन की समस्याओं को भी बढ़ा दिया है। एलडीएफ ने कांग्रेस और यूडीएफ के लगभग 10 नेताओं का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में समर्थन किया है।
राज्य में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा और परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे।
