रुपये की गिरावट: क्या ईरान युद्ध है असली कारण?
रुपये की गिरावट का विश्लेषण
किशोर अजवानी के साथ सौ बात की एक बात में चर्चा करते हुए, यह स्पष्ट होता है कि रुपये की गिरावट केवल ईरान युद्ध के कारण नहीं है। वास्तव में, पिछले एक साल में रुपये ने डॉलर के मुकाबले 11% की गिरावट देखी है, जबकि ईरान युद्ध के आरंभ होने के बाद से यह केवल 5% गिरा है। इस स्थिति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि रुपये की स्थिति बिगड़ी कैसे।
रुपये की गिरावट का मुख्य कारण मांग और आपूर्ति का सिद्धांत है। जब किसी वस्तु की मांग बढ़ती है और आपूर्ति स्थिर रहती है, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है। इसी तरह, यदि आपूर्ति बढ़ती है और मांग स्थिर रहती है, तो वस्तु सस्ती हो जाती है। जब हम रुपये की गिरावट की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कम हो रही है।
इसका मुख्य कारण यह है कि डॉलर की मांग बढ़ रही है और आपूर्ति कम हो रही है। भारत में डॉलर की आपूर्ति कम होने के कई कारण हैं, जैसे कि विदेशी कंपनियों का निवेश कम होना। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत की कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में कमी आई है।
पिछले साल, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1600 करोड़ डॉलर से अधिक निकाल लिए। युद्ध के बाद, मार्च और अप्रैल में 2100 करोड़ डॉलर की निकासी हुई। जब निवेशक डॉलर लेकर आते हैं, तो वे रुपये में शेयर खरीदते हैं, जिससे रुपये की आपूर्ति बढ़ती है। लेकिन जब वे डॉलर निकालते हैं, तो रुपये की मांग बढ़ जाती है।
इस स्थिति को समझने के लिए, यह जानना आवश्यक है कि विदेशी निवेश, जिसे FDI कहा जाता है, भी कम हो गया है। 2014-15 से 2022-23 के बीच, भारत में औसतन 3100 करोड़ डॉलर का विदेशी निवेश आया, लेकिन 2024-25 में यह केवल 100 करोड़ डॉलर रह गया।
इस प्रकार, रुपये की गिरावट का मुख्य कारण यह है कि डॉलर की आपूर्ति कम हो रही है और मांग बढ़ रही है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो विदेशी निवेश में कमी आएगी और रुपये की स्थिति और बिगड़ सकती है।
