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शनि देव की पौराणिक कथा: शिव जी की कठिनाई और वक्री दृष्टि का प्रभाव

इस लेख में शनि देव की पौराणिक कथा का वर्णन किया गया है, जिसमें बताया गया है कि कैसे भगवान शिव को शनि देव की वक्री दृष्टि से बचने के लिए कैलाश पर्वत छोड़ना पड़ा। जानें इस कथा के पीछे की गहराई और शनि देव की शक्ति के बारे में। क्या शिव जी वाकई शनि देव की दृष्टि से बच पाए? पढ़ें पूरी कहानी।
 

शनि देव की पौराणिक कथा

शनि देव की पौराणिक कथाImage Credit source: AI

शनि देव की पौराणिक कथा: ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को कर्मफल दाता और न्याय का देवता माना जाता है। कहा जाता है कि जब शनि देव किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो वह व्यक्ति रंक से राजा बन जाता है। लेकिन यदि शनि देव क्रोधित हो जाएं, तो उनकी वक्री दृष्टि से जीवन में कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

यह माना जाता है कि शनि देव की वक्री दृष्टि से न केवल मनुष्य, बल्कि देवता भी नहीं बच पाते। एक बार शनि देव ने भगवान शिव पर अपनी वक्री दृष्टि डाली, जिसके कारण भगवान शिव को कैलाश पर्वत छोड़ना पड़ा। आइए इस कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

कथा के अनुसार…

कथा के अनुसार, एक बार शनि देव कैलाश पर्वत पहुंचे और भगवान शिव को प्रणाम किया। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि अगले दिन वे उनकी राशि में प्रवेश करेंगे, जिससे उनकी वक्री दृष्टि उन पर पड़ेगी। इस चेतावनी के बाद, भगवान शिव कैलाश छोड़कर धरती पर गए और हाथी का रूप धारण कर लिया।

कुछ समय बाद, भगवान शिव ने सोचा कि शनि देव की वक्री दृष्टि का समय समाप्त हो चुका है। इसलिए, उन्होंने कैलाश लौटने का निर्णय लिया। जब वे लौटे, तो उन्होंने देखा कि शनि देव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इस पर भगवान शिव प्रसन्न हुए और कहा कि शनि देव की दृष्टि का उन पर कोई असर नहीं हुआ।

भगवान शिव की प्रसन्नता

भगवान शिव ने शनि देव से कहा कि उनकी वक्री दृष्टि का समय बीत चुका है। इस पर शनि देव ने शिव जी को प्रणाम किया और कहा कि उनकी वक्री दृष्टि से कोई नहीं बच सकता। यह उनकी वक्री दृष्टि का प्रभाव था कि भगवान शिव को देव योनि से पशु योनि में जाना पड़ा। यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने शिष्य को गले लगा लिया।

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