वैशाख पूर्णिमा: संतान सुख और दीर्घायु का पर्व
वैशाख पूर्णिमा का महत्व
सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष स्थान है। हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा आती है, जिसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। वैशाख माह की पूर्णिमा को वैशाख बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है, जो इस वर्ष 1 मई को मनाई जाएगी। मान्यता है कि इसी दिन गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा विधिपूर्वक करते हैं। पवित्र नदियों में स्नान और दान का भी महत्व है। इस दिन वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करने से विष्णु जी की कृपा प्राप्त होती है।
वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा
प्राचीन काल में कांतिका नामक समृद्ध नगर में चंद्रहास्य नामक राजा शासन करता था। वहीं धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहता था। उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वे दुखी थे। एक दिन नगर में एक साधु आए, जो भिक्षा मांगते थे, लेकिन धनेश्वर के घर नहीं जाते थे। इस पर दंपत्ति ने साधु से इसका कारण पूछा।
साधु ने बताया कि निःसंतान घर से भिक्षा लेना अशुभ माना जाता है। यह सुनकर धनेश्वर ने साधु से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। साधु ने उन्हें मां चंडी की पूजा करने का सुझाव दिया। दंपत्ति ने श्रद्धा से व्रत का पालन किया।
उनकी भक्ति से मां काली प्रकट हुईं और सुशीला को पुत्र का आशीर्वाद दिया। मां ने कहा कि हर पूर्णिमा को दीपक जलाना है और दीपकों की संख्या बढ़ाते जाना है, जब तक कि यह 32 न हो जाए। दंपत्ति ने इस नियम का पालन किया और सुशीला ने देवदास नामक पुत्र को जन्म दिया।
जब देवदास बड़ा हुआ, तो उसे शिक्षा के लिए काशी भेजा गया। वहां एक विचित्र घटना घटी, जिसमें उसका विवाह धोखे से कर दिया गया। जब उसकी मृत्यु का समय आया, तो मृत्यु ने उसे नहीं छुआ। यमराज ने इस रहस्य को जानने का प्रयास किया।
यह पता चला कि देवदास के माता-पिता द्वारा पूर्णिमा का व्रत और मां काली की आराधना के कारण उसे दिव्य संरक्षण मिला था। इस प्रकार, वैशाख पूर्णिमा का व्रत संतान सुख और दीर्घायु का वरदान देने वाला माना जाता है।