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मलमास की कथा: भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से मिला नया नाम

इस लेख में मलमास की पौराणिक कथा का वर्णन किया गया है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने इसे पुरुषोत्तम मास का नाम दिया। जानें कि कैसे मलमास ने भगवान विष्णु के पास अपनी व्यथा रखी और श्रीकृष्ण ने उसे नया नाम देकर उसका उद्धार किया। यह कथा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि हमें जीवन के गहरे अर्थों को भी समझाती है।
 

मलमास की व्यथा

एक प्राचीन कथा के अनुसार, मलमास, जिसे अधिकमास भी कहा जाता है, भगवान श्रीहरि विष्णु के पास पहुंचा। उसने आंसुओं से भरी आंखों के साथ कहा, 'हे कृपानिधान, क्या मैं त्याज्य हूं? सूर्य की संक्रांति के बिना, लोग मुझे तिरस्कृत कर रहे हैं। मैं स्वामीहीन हूं और शुभ कार्यों के लिए स्वीकार नहीं किया जा रहा। कृपया मेरी सहायता करें।' इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि उनका धाम अजर और अमर है, फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?


श्रीकृष्ण के समक्ष मलमास

मलमास ने उत्तर दिया कि जगत के सभी मुहूर्त, पक्ष, क्षण और मास अपने स्वामियों के साथ निर्विघ्न हैं, लेकिन मैं ऐसा हूं जिसका कोई स्वामी नहीं है। भगवान विष्णु ने उसकी पीड़ा को समझा और उसे लेकर भगवान कृष्ण के पास गए। मलमास ने अपनी व्यथा श्रीकृष्ण के सामने भी रखी।


श्रीकृष्ण का उपकार

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जिसका कोई नाम, गोत्र, पिता और वेश नहीं है, उसे मेरा स्मरण करना चाहिए। मैं ही उसका नाम, गोत्र और पिता हूं। वेदों में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है। इसलिए मैं मलमास को अपना स्वामी मानता हूं। अब से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाएगा। जो भी इस मास में मेरा ध्यान करेगा, उसे गोलोक की प्राप्ति होगी।


पुरुषोत्तम मास का महत्व

जिस महीने में भगवान सूर्य का किसी राशि में संक्रमण नहीं होता, उसे मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यदि एक ही महीने में दो संक्रांतियां होती हैं, तो वह मास क्षय मास कहलाता है।