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कालाष्टमी पूजा विधि: पहली बार व्रत करने वालों के लिए आवश्यक नियम

9 मई को ज्येष्ठ महीने का पहला कालाष्टमी व्रत मनाया जाएगा, जो भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव को समर्पित है। इस लेख में पहली बार व्रत करने वालों के लिए आवश्यक नियम और पूजा विधि का विवरण दिया गया है। जानें कि इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं, ताकि आपकी पूजा विधिपूर्वक संपन्न हो सके।
 

कालाष्टमी पूजा की जानकारी

कालाष्टमी पूजा विधि: 9 मई, शनिवार को ज्येष्ठ मास का पहला कालाष्टमी व्रत मनाया जाएगा। यह मासिक व्रत भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव को समर्पित है, जो हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आयोजित किया जाता है। यदि आप इस बार कालाष्टमी का व्रत पहली बार कर रहे हैं, तो पूजा से जुड़े नियमों को जानना आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, ताकि आप इस दिन कोई गलती न करें और पूजा सही तरीके से संपन्न हो सके।


Kalashtami : पहली बार रख रहे हैं कालाष्टमी व्रत? तो जान लें ये जरूरी नियम, वरना अधूरी रह जाएगी पूजा!


कालाष्टमी के दिन क्या न करें

कालाष्टमी के दिन कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। इस दिन किसी भी जीव, विशेषकर कुत्ते को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए, क्योंकि कुत्ता भगवान काल भैरव का वाहन माना जाता है।


इसके अलावा, झूठ बोलने, छल-कपट करने और किसी का अपमान करने से भी बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए और केवल सात्विक आहार लेना शुभ माना जाता है। काल भैरव की पूजा निशिता काल यानी अर्धरात्रि में करना विशेष फलदायी माना गया है।


कालाष्टमी के दिन करने योग्य शुभ कार्य

  • सरसों के तेल का दीपक

इस दिन भगवान काल भैरव के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। दीपक में थोड़े से काले तिल डालने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।


  • भोग लगाएं

इस पावन दिन काल भैरव को उड़द की दाल के बड़े, इमरती या हलवा-पूरी का भोग लगाने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इससे संकट और बाधाएं दूर होती हैं।


  • मंत्र जाप करें

कालाष्टमी पर काल भैरव के मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। श्रद्धा और विश्वास के साथ मंत्र जाप करने से भय, शत्रु और कष्टों से मुक्ति मिलती है।


मंत्र:

ॐ भैरवाय नमः॥

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं॥