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सोशल मीडिया और पत्रकारिता: बदलते रुझान पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सोशल मीडिया और पत्रकारिता के बदलते रुझानों पर गहन चर्चा की गई। वक्ताओं ने सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार साझा किए, साथ ही पत्रकारिता के मूल्यों की पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया। विभिन्न देशों के विशेषज्ञों ने डिजिटल मीडिया की चुनौतियों और अवसरों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इस संगोष्ठी ने पत्रकारिता और जनसंचार के भविष्य को लेकर सार्थक चिंतन को नई दिशा प्रदान की।
 

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संगोष्ठी का आयोजन

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग ने "सोशल मीडिया के युग में पत्रकारिता और जनसंचार में बदलते रुझान" विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी के दूसरे दिन शनिवार को "जनसंचार बनाम सोशल मीडिया" पर एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा हुई।


मुख्य वक्ता का दृष्टिकोण

इस सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. के. जी. सुरेश, जो इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली के निदेशक हैं, ने सोशल मीडिया के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि इसने जनसंचार को नई दिशा दी है और मीडिया के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया ने कई ऐसे मुद्दों को उजागर किया है जो पहले मुख्यधारा मीडिया से छिपे हुए थे।


सोशल मीडिया की चुनौतियाँ

हालांकि, प्रो. सुरेश ने सोशल मीडिया से जुड़ी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रील्स संस्कृति के कारण कंटेंट में सतहीपन बढ़ गया है। एक मिनट में सब कुछ देखने की चाह ने गुणवत्ता को प्रभावित किया है। आज कंटेंट क्रिएशन का मुख्य उद्देश्य केवल यूज़र का ध्यान कुछ सेकंड के लिए खींचना रह गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि युवा वर्ग गंभीर समाचार पत्रों से दूर होकर रील्स संस्कृति में उलझ गया है, जिससे ट्रिवियलाइजेशन बढ़ रहा है।


व्यक्तिगत पत्रकारिता का खतरा

प्रो. सुरेश ने यह भी कहा कि आज पॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यूज़ और मोनेटाइजेशन पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जिससे पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है। उन्होंने कहा कि विषयों के बजाय व्यक्तियों को महत्व देना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। पत्रकारिता को बचाने के लिए मुद्दा-प्रधान दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करना आवश्यक है।


क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन

प्रो. सुरेश ने बताया कि क्षेत्रीय भाषाओं में उत्कृष्ट शोधपरक लेखन हो रहा है, लेकिन पाठकों की संख्या घट रही है। खोजी पत्रकारिता, जो पत्रकारिता का आधार स्तंभ रही है, आज कमजोर पड़ती दिख रही है। डिजिटल मीडिया से यह अपेक्षा थी कि वह हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बनेगा, लेकिन टीआरपी और व्यूज़ आधारित प्रवृत्तियों के कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट रहे हैं।


विशिष्ट वक्ता का दृष्टिकोण

सत्र के विशिष्ट वक्ता, पूर्व कुलपति प्रो. के. वी. नागराज ने कहा कि सोशल मीडिया मोबोक्रेसी का रूप ले रहा है। उन्होंने बताया कि बड़े कारोबारी और कॉरपोरेट घराने विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया को नियंत्रित कर रहे हैं। यूट्यूब पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें जिम्मेदारी और जवाबदेही का अभाव है।


सोशल मीडिया का प्रभाव

प्रो. नागराज ने कहा कि तकनीक आज एक राक्षस बनती जा रही है, जिसे नियंत्रित करने के बजाय हम उसे स्वयं पर शासन करने दे रहे हैं। उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि विचारधारा अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार, बिना विचारधारा के संचार का कोई अर्थ नहीं है।


पैनल चर्चा के निष्कर्ष

पैनल चर्चा के दौरान वक्ताओं ने सहमति जताई कि प्रिंट मीडिया आज भी एक शक्तिशाली माध्यम है और समाज को दिशा देने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। संगोष्ठी से सार्थक निष्कर्ष निकलने की आशा व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने पत्रकारिता के मूल्यों की पुनर्स्थापना पर बल दिया।


अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के विचार

इस संगोष्ठी में अमेरिका, रूस, नेपाल, बांग्लादेश और मलेशिया के विषय विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। कुल 180 शोध पत्रों का वाचन किया गया, जिनमें डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और समकालीन पत्रकारिता से जुड़े विविध पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ।


अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं के विचार

बॉयसी यूनिवर्सिटी, अमेरिका की डॉ. इरीना बाबिक ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने संचार को अधिक सहभागी और त्वरित बनाया है, किंतु विश्वसनीयता बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। लोमोनोसोव मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी, रूस की डॉ. अन्ना ग्लैडकोवा ने कहा कि सोशल मीडिया ने वैश्विक संवाद को नई गति दी है, लेकिन एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट के कारण समाज में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।


संगोष्ठी का समापन

पैनल चर्चा में उपस्थित वक्ताओं और अतिथियों का स्वागत विभागाध्यक्ष डॉ ज्ञानप्रकाश मिश्र ने अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ व स्मृति चिह्न भेंट कर किया। सत्र की अध्यक्षता कम्युनिकेशन टुडे के संपादक संजीव भानावत ने की।